
अध्याय ९९ — युयुधान-दुःशासन-युद्धम् (Chapter 99: Sātyaki and Duḥśāsana’s engagement)
Upa-parva: Yuyudhāna–Duḥśāsana Saṅgrāma (Episode: Sātyaki’s engagement with Duḥśāsana and Trigartas)
Saṃjaya narrates Duḥśāsana’s assault on Śaineya/Yuyudhāna (Sātyaki), beginning with dense arrow volleys that fail to destabilize Sātyaki’s stance. Sātyaki counters by blanketing Duḥśāsana with missiles, prompting the Kaurava command to direct Trigarta chariots against Sātyaki. Three thousand Trigarta chariots encircle him with synchronized resolve; Sātyaki answers with concentrated archery, cutting down five hundred leading fighters and breaking the formation. The battlefield is described through imagery of severed chariots, fallen standards, and blood-soaked ground likened to blossoming trees. The surviving Trigartas recoil toward Droṇa’s sector. Sātyaki advances toward Arjuna’s line; Duḥśāsana renews pursuit, exchanging volleys, losing his bow and chariot implements, and attempting a lethal śakti-throw that Sātyaki fragments mid-flight. Duḥśāsana re-arms and roars, but Sātyaki strikes decisively—killing horses and charioteer and disabling the chariot—yet does not deliver the final kill, explicitly recalling Bhīmasena’s prior vow to slay Dhṛtarāṣṭra’s sons. Having subdued Duḥśāsana, Sātyaki departs swiftly in the direction Arjuna has taken.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है—जब संग्राम अपने चरम को छू रहा था, धृष्टद्युम्न सूर्य-सा दीप्त होकर द्रोणाचार्य पर टूट पड़ा; उसी क्षण अन्य मोर्चों पर भी भीम और युधिष्ठिर अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वियों को ललकारते हैं। → धृष्टद्युम्न का लक्ष्य स्पष्ट है—द्रोण का वध। वह शरवर्षा करता हुआ रथ-रथ पर चढ़ आता है; द्रोण भी अद्भुत कौशल से उसके हर छिद्र को ढँकते हैं। रणभूमि में रथियों का रथियों से, अश्वारोहियों का अश्वारोहियों से, गजराजों का गजराजों से और पदातियों का पदातियों से घोर संमर्दन चलता है; चारों ओर कबन्ध उठे दिखते हैं—युद्ध का भयावह दृश्य मन को कंपा देता है। → धृष्टद्युम्न लाल घोड़ों पर खड़ा होकर खड्ग घुमाता है, द्रोण पर झपटता है—मानो मांस की चाह में बाज़ शिकार पर टूट पड़े। द्रोण को क्षण भर भी अवसर नहीं मिलता; तभी शिने का पौत्र सात्यकि बीच में कूद पड़ता है और द्रोण के वक्षस्थल में छब्बीस तीक्ष्ण बाणों से प्रहार कर धृष्टद्युम्न को बचा लेता है। → द्रोण का ध्यान सात्यकि की ओर खिंचता है; इस उलझाव का लाभ उठाकर पाञ्चालों के रथ द्रोण पर दबाव बढ़ाते हैं और धृष्टद्युम्न को पीछे खींचकर पुनः संगठित करते हैं। मोर्चा टूटता नहीं, पर द्रोण-धृष्टद्युम्न का निर्णायक क्षण टल जाता है। → द्रोण सात्यकि से जूझते हुए भी अजेय-सा बना रहता है—अब प्रश्न यह है कि धृष्टद्युम्न का प्रतिज्ञात लक्ष्य कब और कैसे पूरा होगा?
Verse 1
अपन प्रा बछ। अं सप्तनवतितमो< ध्याय: द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिद्धारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा संजय उवाच तथा तस्मिन् प्रवत्ते तु संग्रामे लोमहर्षणे । कौरवेयांस्त्रिधाभूतान् पाण्डवा: समुपाद्रवन्
سنجے نے کہا—اے راجن! جب وہ رونگٹے کھڑے کر دینے والی جنگ چھڑ گئی، تو پانڈوؤں کی فوج نے تین حصّوں میں بٹے ہوئے کوروؤں پر زبردست دھاوا بول دیا۔
Verse 2
जलसंध॑ महाबाहुं भीमसेनो< भ्यवर्तत । युधिष्ठिर: सहानीक: कृतवर्माणमाहवे,भीमसेनने महाबाहु जलसंधपर आक्रमण किया और सेनासहित युधिष्ठिरने युद्धस्थलमें कृतवर्मापर धावा बोल दिया
بھیم سین نے مہاباہو جلَسندھ پر یلغار کی، اور یُدھشٹھِر نے اپنی فوج سمیت میدانِ جنگ میں کِرت وَرما پر چڑھائی کر دی۔
Verse 3
किरंस्तु शरवर्षाणि रोचमान इवांशुमान् | धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणमभ्यद्रवद् रणे
تیروں کی بارش برساتا ہوا، سورج کی مانند درخشاں دھِرِشتَدیُمن، اے مہاراج، میدانِ جنگ میں درون پر ٹوٹ پڑا۔
Verse 4
महाराज! जैसे प्रकाशमान सूर्य सहस्रों किरणोंका प्रसार करते हैं, उसी प्रकार धृष्टद्युम्नने बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया ।।
سنجے نے کہا—اے مہاراج! جیسے روشن آفتاب ہزاروں کرنیں پھیلاتا ہے، ویسے ہی دھِرِشتدیومن نے تیروں کی بوچھاڑ کرتے ہوئے میدانِ جنگ میں درون آچاریہ پر یلغار کی۔ پھر دونوں طرف غضب بھڑک اٹھا اور کورو و پانڈو کے کمان داروں کے درمیان، ایک دوسرے پر لپکتے ہوئے، سخت معرکہ برپا ہو گیا۔
Verse 5
संक्षये तु तथाभूते वर्तमाने महाभये । उन्डी भूतेषु सैन्येषु युध्यमानेष्वभीतवत्
سنجے نے کہا—جب وہ نہایت ہولناک قتل و غارت شروع ہو گئی اور لشکر ابتری میں پڑ کر بھی گویا بےخوف ہو کر آمنے سامنے لڑنے لگے، تب طاقتور درون آچاریہ نے پانچال کے راجکمار دھِرِشتدیومن کے ساتھ معرکہ کرتے ہوئے تیروں کی ایک ایسی عجیب و غریب بوچھاڑ شروع کی کہ وہ حیرت انگیز معلوم ہوئی۔
Verse 6
द्रोण: पाउ्चालपुत्रेण बली बलवता सह । यदक्षिपत् पृषत्कौघांस्तदद्भुतमिवाभवत्
سنجے نے کہا—طاقتور درون، طاقتور پانچال پُتر دھِرِشتدیومن کے ساتھ معرکے میں، جب تیروں کے گھنے جھنڈ برساتا رہا تو وہ منظر گویا عجیب و غریب معلوم ہوا۔
Verse 7
पुण्डरीकवनानीव विध्वस्तानि समन्ततः । चक्राते द्रोणपाञ्चाल्यौ नृणां शीर्षाण्यनेकश:
دروṇ اور پانچالی (دھِرِشتدیومن) نے بہت سے آدمیوں کے سر کاٹ کر گرا دیے؛ وہ چاروں طرف بکھرے ہوئے یوں دکھائی دیتے تھے گویا ہر سمت کنول کے باغ اجڑ گئے ہوں۔
Verse 8
विनिकीर्णानि वीराणामनीकेषु समन्तत: । वस्त्राभरणशस्त्राणि ध्वजवर्मायुधानि च,चारों ओर सेनाओंमें वीरोंके बहुत-से वस्त्र, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, ध्वज, कवच तथा आयुध छिन्न-भिन्न होकर बिखरे पड़े थे
چاروں طرف جنگی صفوں میں بہادروں کے کپڑے، زیورات، ہتھیار، جھنڈے، زرہیں اور جنگی سازوسامان ٹوٹ پھوٹ کر بکھرا پڑا تھا۔
Verse 9
तपनीयततनुत्राणा: संसिक्ता रुधिरेण च | संसक्ता इव दृश्यन्ते मेघसंघा: सविद्युत:,सुवर्णका कवच बाँधे तथा खूनसे लथपथ हुए सैनिक परस्पर सटे हुए बिजलियोंसहित मेघसमूहोंके समान दिखायी देते थे
سنجے نے کہا—سنہری زرہیں پہنے اور خون میں تر وہ جنگجو آپس میں یوں گتھے ہوئے دکھائی دیتے تھے جیسے بجلیوں سے چمکتے بادلوں کے گچھے۔
Verse 10
कुण्जराश्वनरानन्ये पातयन्ति सम पत्रिभि: | तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथा:,बहुत-से दूसरे महारथी चार हाथके धनुष खींचते हुए अपने पंखयुक्त बाणोंद्वारा हाथी, घोड़े और पैदल मनुष्योंको मार गिराते थे
سنجے نے کہا—بہت سے دوسرے مہارَتھی تال کے درخت جتنے لمبے کمان کھینچتے ہوئے، پر دار تیروں سے ہاتھیوں، گھوڑوں اور پیادوں کو گرا دیتے تھے۔
Verse 11
असिचर्माणि चापानि शिरांसि कवचानि च । विप्रकीर्यन्त शूराणां सम्प्रहारे महात्मनाम्,उन महामनस्वी वीरोंके संग्राममें योद्धाओंके खड्ग, ढाल, धनुष, मस्तक और कवच कटकर इधर-उधर बिखरे जाते थे
سنجے نے کہا—ان عظیم ہمت والوں کی ہولناک ٹکر میں سورماؤں کی تلواریں، ڈھالیں، کمانیں، سر اور زرہیں کٹ کر ہر سمت بکھر جاتی تھیں۔
Verse 12
उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः । अदृश्यन्त महाराज तस्मिन् परमसंकुले,महाराज! उस महाभयानक युद्धमें चारों ओर असंख्य कबन्ध खड़े दिखायी देते थे
سنجے نے کہا—اے مہاراج! اس نہایت ہنگامہ خیز اور ہولناک جنگ میں ہر طرف بے شمار کَبَندھ—سر کٹے دھڑ—کھڑے دکھائی دیتے تھے۔
Verse 13
गृध्रा: कड़्का बका: श्येना वायसा जम्बुकास्तथा । बहुश: पिशिताशाश्च तत्रादृश्यन्त मारिष,आर्य! वहाँ बहुत-से गीध, कंक, बगले, बाज, कौए, सियार तथा अन्य मांसभक्षी प्राणी दृष्टिगोचर होते थे
سنجے نے کہا—اے بزرگ! وہاں بہت سے گِدھ، کَنک، بگلے، باز، کوّے، گیدڑ اور دوسرے گوشت خور جانور بار بار دکھائی دیتے تھے۔
Verse 14
भक्षयन्तश्न मांसानि पिबन्तश्नापि शोणितम् | विलुम्पन्तश्न केशांश्व मज्जाश्व बहुधा नूप,नरेश्वर! वे मांस खाते, रक्त पीते और केशों तथा मज्जाको बारंबार नोचते थे
سنجے نے کہا—اے نریشور! وہ گوشت نوچ نوچ کر کھاتے، خون پیتے، اور بار بار بال اور ہڈیوں کا گودا تک کھینچ کر نکالتے تھے۔
Verse 15
आकर्षन्त: शरीराणि शरीरावयवांस्तथा । नराश्वगजसंघानां शिरांसि च ततस्ततः:,मनुष्यों, घोड़ों तथा हाथियोंके समूहोंके सम्पूर्ण शरीरों और अवयवों एवं मस्तकोंको इधर-उधर खींचते थे
سنجے نے کہا—وہ انسانوں، گھوڑوں اور ہاتھیوں کے جتھوں کے دھڑ، کٹے ہوئے اعضا اور سروں کو ادھر اُدھر گھسیٹتے پھرتے تھے۔
Verse 16
कृतास्त्रा रणदीक्षाभिदीक्षिता रणशालिन: । रणे जयं प्रार्थयाना भूशं युयुधिरे तदा
سنجے نے کہا—اسلحہ چلانے میں ماہر اور رن میں درخشاں وہ سورما رن-یَجْن کی دِیکشا لے کر، فتح کی آرزو میں اُس وقت نہایت شدت سے لڑنے لگے۔
Verse 17
असिमार्गान् बहुविधान् विचेरु: सैनिका रणे । ऋष्टिभि: शक्तिभि: प्रासै: शूलतोमरपट्टिशै:
سنجے نے کہا—میدانِ جنگ میں سپاہی تلوار کے بے شمار انداز کے داؤ پیچ دکھاتے پھرتے تھے؛ اور غضب میں بھرے آدمی نیزوں، شکتیوں، بھالوں، ترشولوں، تومر اور کلہاڑی نما پٹّش وغیرہ سے ایک دوسرے پر وار کرتے تھے۔
Verse 18
गदाभि: परिधैश्नान्यैरायुथैश्व भुजैरपि । अन्योन्यं जष्निरे क्रुद्धा युद्धरड्गरगता नरा:
سنجے نے کہا—جنگ کے میدان میں اترے ہوئے غضب ناک آدمی گداؤں، لوہے کے ڈنڈوں (پریغ)، دوسرے ہتھیاروں سے، بلکہ اپنی بازوؤں سے بھی ایک دوسرے پر ٹوٹ پڑے۔
Verse 19
रथिनो रथिभश्रि: सार्थमश्वचारोहाश्ष सादिभि: | मातड़् वरमातज्जैः पदाताश्ष पदातिभि:,रथी रथियोंके, घुड़सवार घुड़सवारोंके, मतवाले हाथी श्रेष्ठ गजराजोंके और पैदल योद्धा पैदलोंके साथ युद्ध कर रहे थे
سنجے نے کہا—اس معرکے کے ہنگامے میں رتھی رتھیوں کے ساتھ، گھڑ سوار گھڑ سواروں کے ساتھ، مست و زورآور ہاتھیوں کے سردار ہاتھیوں کے سرداروں کے ساتھ، اور پیادے پیادوں کے ساتھ برسرِ پیکار تھے۔ یوں لشکر کے ہر شعبے میں ہم پلہ حریف آمنے سامنے آ کر جنگ کی ہیبت اور شدت کو بڑھا رہے تھے۔
Verse 20
क्षीबा इवान्ये चोन्मत्ता रज्भेष्विव च वारणा: | उच्चुक्रुशु रथान्योन्यं जघ्नुरन्योन्यमेव च
سنجے نے کہا—اس میدانِ جنگ میں بہت سے دوسرے یوں تھے جیسے نشے میں دھت آدمی، اور جیسے رسیوں میں الجھے ہوئے پاگل ہاتھی۔ وہ زور سے دھاڑتے، ایک دوسرے کے رتھوں سے ٹکراتے اور باہم بار بار ضربیں لگاتے تھے۔
Verse 21
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मय्यादे विशाम्पते । धृष्टद्युम्नो हयानश्वैद्रोणस्य व्यत्यमिश्रयत्
سنجے نے کہا—اے رعایا کے سردار! جب وہ جنگ بےقید و بےضابطہ انداز میں جاری تھی، اسی وقت دھِرِشتدیومن نے اپنے رتھ کے گھوڑوں کو درون کے گھوڑوں کے ساتھ بالکل قریب لا کر گتھم گتھا کر دیا۔
Verse 22
ते हया: साध्वशोभन्त मिश्रिता वातरंहस: । पारावतसवर्णाश्च रक्तशोणाश्च संयुगे
سنجے نے کہا—اس معرکے میں وہ گھوڑے، جو ہوا کی مانند تیز اور باہم گتھے ہوئے تھے، نہایت شاندار دکھائی دیتے تھے؛ کچھ کبوتر کے رنگ کے تھے اور کچھ سرخ و شفقی۔
Verse 23
धृष्टद्युम्नके घोड़ोंका रंग कबूतरके समान था और द्रोणाचार्यके घोड़े लाल थे। उस युद्धके मैदानमें परस्पर मिले हुए वे वायुके समान वेगशाली अश्व बड़ी शोभा पा रहे थे ।।
سنجے نے کہا—اے راجن! کبوتر رنگ گھوڑے جب سرخ و شفقی گھوڑوں کے ساتھ مل گئے تو میدانِ جنگ میں وہ بجلی سے چمکتے بادلوں کی مانند نہایت دلکش دکھائی دیے۔
Verse 24
धृष्टद्युम्नस्तु सम्प्रेक्ष्य द्रोणमभ्याशमागतम् । असिचर्माददे वीरो धनुरुत्सूज्य भारत,भारत! वीर धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यको अत्यन्त निकट आया हुआ देख धनुष छोड़कर हाथमें ढाल और तलवार ले ली
دروṇ آچاریہ کو نہایت قریب آتا دیکھ کر بہادر دھرِشتدیومن نے کمان چھوڑ دی اور تلوار اور ڈھال سنبھال لی۔
Verse 25
चिकीर्षु्दुष्करं कर्म पार्षत: परवीरहा । ईषया समत्तिक्रम्य द्रोणस्प रथमाविशत्
پَرَوِیر ہنتا، پِرشَت پُتر دھرِشتدیومن دشکر کارنامہ کرنے کا ارادہ کیے ہوئے تھا؛ اس نے رتھ کے ایشاڈنڈ کا سہارا لے کر اپنے رتھ کو لانگھا اور دروṇ کے رتھ میں جا چڑھا۔
Verse 26
अतिष्ठद् युगमध्ये स युगसंनहनेषु च । जघनार्थेषु चाश्वानां तत् सैन्यान्यभ्यपूजयन्
وہ ایک پاؤں جُوئے کے عین بیچ میں اور دوسرا جُوئے کی باندھ کے پاس گھوڑوں کے پچھلے حصے پر رکھ کر کھڑا ہو گیا؛ اس جری کارنامے پر تمام لشکر نے بار بار اس کی ستائش کی۔
Verse 27
खड्गेन चरतस्तस्य शोणाश्वानधितिष्ठत: । न ददर्शान्तरं द्रोणस्तदद्भुतमिवाभवत्
سرخ گھوڑوں پر کھڑا ہو کر تلوار گھماتے ہوئے دھرِشتدیومن پر وار کرنے کے لیے دروṇ کو ذرّہ بھر بھی موقع نہ ملا؛ یہ گویا ایک عجیب و غریب بات تھی۔
Verse 28
यथा श्येनस्य पतन वनेष्वामिषगृद्धिन: । तथैवासीदभीसारस्तस्य द्रोणं जिघांसत:
جیسے جنگل میں گوشت کی بھوک سے بےتاب باز جھپٹ کر نیچے آتا ہے، ویسے ہی دروṇ کو قتل کرنے کی نیت سے اس کا دھاوا بھی ویسا ہی تیز تھا۔
Verse 29
जैसे वनमें मांसकी इच्छा रखनेवाला बाज झपट्टा मारता है, उसी प्रकार द्रोणको मार डालनेकी इच्छासे उनपर धृष्टद्युम्मका यह सहसा आक्रमण हुआ था ।।
سنجے نے کہا—پھر دروṇ نے سو تیروں سے دروپد کے بیٹے کی سو چاندی نشانوں والی ڈھال کاٹ کر گرا دی، اور مزید دس تیروں سے اس کی تلوار بھی ریزہ ریزہ کر دی۔
Verse 30
हयांश्वैव चतुःषष्ट्या शराणां जध्निवान् बली | ध्वजं क्षत्रं च भल्लाभ्यां तथा तौ पार्ष्णिसारथी
سنجے نے کہا—اس زورآور نے چونسٹھ تیروں سے گھوڑوں کو مار گرایا؛ اور دو بھلّوں سے علم اور چھتر بھی کاٹ دیے—یوں وہ ثابت قدم رتھ بان تھا۔
Verse 31
बलवान् आचार्यने चौंसठ बाणोंसे धृष्टद्युम्नके चारों घोड़ोंको मार डाला। फिर दो भल्लोंसे ध्वज और छत्र काटकर उनके दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी मार गिराया ।।
سنجے نے کہا—آچار्य نے چونسٹھ تیروں سے دھِرِشتدیومن کے چاروں گھوڑے مار ڈالے۔ پھر دو بھلّوں سے علم اور چھتر کاٹ گرائے اور دونوں پہلو کے محافظوں کو بھی ڈھا دیا۔ اس کے بعد اس نے کمان کو کان تک کھینچ کر ایک اور جان لیوا تیر یوں چھوڑا، گویا وجر دھاری اندر وجر پھینک رہا ہو۔
Verse 32
त॑ चतुर्दशभिस्ती&णैर्बाणैश्विच्छेद सात्यकि: । ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नं व्यमोचयत्
سنجے نے کہا—تب سات्यکی نے چودہ تیز تیروں سے اس تیر کو کاٹ ڈالا اور یوں آچار्यِ برتر کے قبضے میں آئے ہوئے دھِرِشتدیومن کو چھڑا لیا۔
Verse 33
सिंहेनेव मृगं ग्रस्तं नरसिंहेन मारिष । द्रोणेन मोचयामास पाज्चाल्यं शिनिपुड्भव:
سنجے نے کہا—اے معزز بادشاہ! جیسے شیر ہرن کو دبوچ لیتا ہے، ویسے ہی انسانوں میں شیر دروṇ نے پانچال کے دھِرِشتدیومن کو جکڑ لیا تھا؛ مگر شِنی نسل کے سات्यکی نے اسے چھڑا لیا۔
Verse 34
सात्यकिं प्रेक्ष्य गोप्तारं पाउ्चाल्यं च महाहवे । शराणां त्वरितो द्रोण: षड्विंशत्या समार्पयत्
عظیم معرکے میں ساتیہ کی کو پانچال کے شہزادے دھِرِشتدیومن کا محافظ بنا دیکھ کر درون آچاریہ نے فوراً ہی تیزی سے اس پر چھبیس تیروں کی بوچھاڑ کر دی۔
Verse 35
ततो द्रोणं शिने: पौत्रो ग्रसन्तमपि सृजजयान् । प्रत्यविध्यच्छितैर्बाणै: षड्विंशत्या स्तनान्तरे
تب شِنی کے پوتے ساتیہ کی نے—اگرچہ درون آچاریہ سِرِنجَیوں کا قَتلِ عام کر رہے تھے—جوابی وار میں درون کے سینے کے بیچ چھبیس تیز تیروں سے چھید کر گہرا زخم لگایا۔
Verse 36
ततः सर्वे रथास्तूर्ण पाञज्चाल्या जयगृद्धिन: । सात्वताभिस्ते द्रोणे धृष्टद्युम्नमवाक्षिपन्
جب درون آچاریہ ساتیہ کی کے ساتھ جنگ میں الجھ گئے تو فتح کے خواہاں تمام پانچال رتھی فوراً آگے بڑھے، دھِرِشتدیومن کو اٹھا کر اپنے رتھ پر بٹھایا اور اسے خطرے کے ہجوم سے دور لے گئے۔
Verse 97
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणधृष्टझुम्नयुद्धे सप्तनवतितमो<ध्याय:
یوں شری مہابھارت کے درون پَرو میں، جَیَدرتھ وَدھ پَرو کے ضمن میں، درون اور دھِرِشتدیومن کے یُدھ کے بیان میں ستانوےواں ادھیائے ختم ہوا۔
Whether tactical superiority should culminate in immediate execution of a disabled opponent, or be restrained to honor a prior allied vow—Sātyaki chooses restraint due to Bhīma’s pledged responsibility for Dhṛtarāṣṭra’s sons.
The narrative models how intention and prior commitments structure ethical agency: even in extreme conflict, action is evaluated not only by outcome but by fidelity to publicly assumed obligations.
No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as battlefield reportage whose interpretive weight comes from the embedded reminder of vow-authority within the epic’s broader dharma framework.
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