Mahabharata Adhyaya 111
Drona ParvaAdhyaya 11158 Versesअलम्बुष-वध से पाण्डव-पक्ष का मनोबल तीव्र बढ़ता है और कौरव-पक्ष में भय/अस्थिरता फैलती है; घटोत्कच का आतंक रण-प्रवाह को पाण्डवों की ओर मोड़ देता है।

Adhyaya 111

कर्णभीमसेनयुद्धम् | Karṇa–Bhīmasena Engagement (Chapter 111)

Upa-parva: Karna–Bhīmasena Saṃgrāma (Combat Episode within Droṇa-parva)

Saṃjaya reports that Karṇa, seeing Dhṛtarāṣṭra’s sons fallen, is overtaken by intense anger and a life-weariness, interpreting his situation as culpable or stained. He rushes Bhīmasena and opens with a volley, which Bhīma answers by rejecting the derisive display and striking Karṇa heavily, including severing Karṇa’s bow. Karṇa re-arms and attempts to overwhelm Bhīma with arrow-cover; Bhīma retaliates by killing Karṇa’s horses and charioteer and cutting down the bow again, forcing Karṇa to dismount and throw a mace, which Bhīma checks with arrows. Bhīma then releases a large barrage; Karṇa parries and succeeds in dislodging Bhīma’s armor, then pins him with additional shots. Bhīma counters by piercing Karṇa’s armor and right arm; observing Karṇa on foot and pressed, Duryodhana orders his sons to bring a replacement chariot. Several named sons advance but Bhīma rapidly fells them along with their chariot-standards and attendants. Karṇa, seeing them slain, enters a state of distress, then mounts a newly prepared chariot and re-engages. The chapter closes with both heroes exchanging dense arrow-storms, described through vivid similes (flowering trees, serpents shedding skins, elephants in contest, thundercloud and mountain), while the Kaurava princes witness Bhīma’s valor, strength, and composure.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं—रणभूमि में निर्भय विचरते हुए अलम्बुष को देखकर घटोत्कच उसके सामने आ खड़ा होता है; राक्षस-वीरों का यह सामना मानो दो प्रलयकारी शक्तियों का टकराव है। → दोनों ‘राक्षससिंह’ विविध मायाओं का प्रयोग करते हैं—इन्द्र और शम्बरासुर के युद्ध की भाँति छल, रूप-परिवर्तन, भ्रम और भीषण प्रहारों से रणक्षेत्र काँप उठता है। अलम्बुष क्रोध में घटोत्कच पर आघात करता है; प्रत्युत्तर में घटोत्कच रथ-समूहों पर उल्काओं-से बाण-वर्षा कर चारों ओर आतंक फैला देता है। महानाद से पृथ्वी कम्पित होती है और सेनाएँ भय-हर्ष के बीच डगमगाती हैं। → घोर विद्ध होने पर भी घटोत्कच अपनी राक्षसी शक्ति समेटकर निर्णायक प्रहार करता है—अलम्बुष (शालकटंकट-पुत्र) के अंग-प्रत्यंग विदीर्ण हो जाते हैं, अस्थियाँ चूर-चूर होती हैं और वह रणभूमि में ढह पड़ता है। घटोत्कच बलासुर-वध के बाद इन्द्र की भाँति सिंहनाद करता है। → अलम्बुष-वध से पाण्डव-सेना में हर्ष की लहर दौड़ती है—कुन्ती-पुत्र सिंहनाद करते हैं, वस्त्र उछालते हैं और रणक्षेत्र में उत्साह का घोष फैलता है। घटोत्कच की उपस्थिति से कौरव-पक्ष में भय और पाण्डव-पक्ष में संबल दृढ़ होता है। → घटोत्कच क्रुद्ध होकर समस्त सेनाओं को भयभीत करता हुआ आगे बढ़ता है—उसकी रात्रिचर-शक्ति के सामने कौरव-नीति अब कौन-सा प्रतिकार रचेगी?

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। असि<-छऋाल जा नवाधिकशततमो<्ध्याय: घटोत्कचद्वारा अलम्बुषका वध और पाण्डव-सेनामें हर्ष- ध्वनि संजय उवाच अलनम्बुषं तथा युद्धे विचरन्तमभीतवत्‌ । हैडिम्बि: प्रययौ तूर्ण विव्याध निशितै: शरै:

سنجے نے کہا—اے راجن! جنگ میں اسی طرح بے خوفی سے گھومتے ہوئے الَمبُش کے پاس ہِڈِمبا کا بیٹا گھٹوتکچ بڑی تیزی سے جا پہنچا اور اسے اپنے تیز تیروں سے چھیدنے لگا۔

Verse 2

तयो: प्रतिभयं युद्धमासीद्‌ राक्षससिंहयो: । कुर्वतोर्विविधा माया: शक्रशम्बरयोरिव

ان دونوں شیر صفت راکشسوں کے درمیان نہایت ہولناک جنگ چھڑ گئی۔ وہ اندرا اور اسور شمبر کی مانند طرح طرح کی مایا اور فریب کے ہتھکنڈے آزماتے تھے۔

Verse 3

अलनम्बुषो भृशं क्रुद्धो घटोत्कचमताडयत्‌ । तयोरयुद्धं समभवद्‌ रक्षोग्रामणिमुख्ययो:

سنجے نے کہا—الَمبُش سخت غضبناک ہو کر گھٹوتکچ پر ٹوٹ پڑا۔ پھر ان دونوں، راکشسوں کے سرداروں اور پیشواؤں کے درمیان آمنے سامنے کی گھمسان لڑائی برپا ہو گئی۔

Verse 4

घटोत्कचस्तु विंशत्या नाराचानां स्तनान्तरे

سنجے نے کہا—گھٹوتکچ نے بیس نارچ تیروں سے اس کے سینے کے مقام پر وار کیا۔

Verse 5

अलम्बुषमथो विद्ध्वा सिंहवद्‌ व्यनदन्मुहुः । घटोत्कचने बीस नाराचोंद्वारा अलम्बुषकी छातीमें गहरी चोट पहुँचाकर बारंबार सिंहके समान गर्जना की ।। ४ $ || तथैवालम्बुषो राजन्‌ हैडिम्बिं युद्धदुर्मदम्‌

سنجے نے کہا—الَمبُش کو وِدھ کر کے گھٹوتکچ بار بار شیر کی طرح گرجا۔ پھر، اے راجن، الَمبُش بھی اسی طرح جنگی خمار میں مست ہَیڈِمب (گھٹوتکچ) کے مقابل آ ڈٹا۔

Verse 6

तथा तौ भृशसंक्रुद्धौ राक्षसेन्द्री महाबलौ

سنجے نے کہا—یوں وہ دونوں نہایت غضبناک، عظیم قوت والے، راکشسوں کے سردار اور راکشسی کی مانند ڈٹے رہے۔

Verse 7

मायाशतसूृजौ नित्यं मोहयन्तौ परस्परम्‌

سنجے نے کہا—وہ دونوں ہمیشہ سینکڑوں مایا رچ کر ایک دوسرے کو فریب و حیرت میں ڈالتے رہے۔

Verse 8

यां यां घटोत्कचो युद्धे मायां दर्शयते नूप

سنجے نے کہا—اے نَرِپ! جنگ میں گھٹوتکچ جو جو مایا دکھاتا ہے، وہ وہی ظاہر ہوتی جاتی ہے۔

Verse 9

तां तामलम्बुषो राजन्‌ माययैव निजध्निवान्‌ | नरेश्वर! घटोत्कच युद्धस्थलमें जो-जो माया दिखाता, उसे अलम्बुष अपनी मायाद्वारा ही नष्ट कर देता था ।। तं॑ तथा युध्यमानं तु मायायुद्धविशारदम्‌

سنجے نے کہا—اے راجن، الَمبُش اپنی ہی مایا سے اُس کی ہر مایا کو پلٹ کر زائل کر دیتا تھا۔ اے نَرَیشور! میدانِ جنگ میں گھٹوتکچ جو جو جادوئی کرشمے دکھاتا، الَمبُش انہیں اپنی مایا ہی سے بے اثر کر دیتا۔ یوں مایائی جنگ میں ماہر وہ یودھا اسی طرح لڑتا رہا…

Verse 10

त एनं॑ भृशसंविग्ना: सर्वतः प्रवरा रथै:

سنجے نے کہا—وہ سخت گھبرا کر اپنے بہترین رتھوں کے ساتھ ہر طرف سے اسے گھیرنے لگے۔

Verse 11

त एन॑ कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष

سنجے نے کہا—اے بزرگ، اسے تنگ دائرے میں قید کر کے انہوں نے رتھ کے ڈنڈے سے اس پر ضرب لگائی۔

Verse 12

सर्वतो व्यकिरन्‌ बाणैरुल्काभिरिव कुञ्जरम्‌ | माननीय नरेश! जैसे जलती हुई उल्काओंद्वारा चारों ओरसे घेरकर हाथीपर प्रहार किया जाता है, उसी प्रकार रथसमूहके द्वारा अलम्बुषको कोष्ठबद्ध करके वे सब लोग चारों ओरसे उसपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ।।

سنجے نے کہا—اے معزز نَرَیشور! جیسے دہکتی ہوئی شہابوں سے چاروں طرف سے گھیر کر ہاتھی پر ضربیں لگائی جاتی ہیں، ویسے ہی رتھوں کے ہجوم نے الَمبُش کو تنگ دائرے میں قید کر کے ہر سمت سے اس پر تیروں کی بارش کر دی۔ مگر اس نے اسلحہ کی مایا سے اُن کے ہتھیاروں کے اُس تیز ریلے کو روک دیا۔

Verse 13

स विस्फार्य धनुर्घोरमिन्द्राशनिसमस्वनम्‌

سنجے نے کہا—اس نے اپنا ہولناک کمان کھینچ کر پوری طرح تان دیا، جس کی آواز اندَر کے وَجر جیسی تھی۔

Verse 14

युधिष्टिरं त्रिभिविद्ध्वा सहदेवं च सप्तभि:,आर्य! उसने युधिष्ठिरको तीन, सहदेवको सात, नकुलको तिहत्तर और द्रौपदीपुत्रोंको पाँच-पाँच बाणोंसे घायल करके घोर गर्जना की

سنجے نے کہا—اس نے یدھشٹھِر کو تین تیروں سے اور سہ دیو کو سات تیروں سے چھیدا؛ پھر نکُل کو تہتر تیروں سے زخمی کیا اور دروپدی کے بیٹوں میں سے ہر ایک کو پانچ پانچ تیروں سے گھائل کر کے اس کے بعد ہولناک للکار بلند کی۔

Verse 15

नकुलं च त्रिसप्तत्या द्रौपदेयांश्व॒ मारिष | पज्चभि: पज्चभिर्विद्ध्वा घोरं॑ नादं ननाद ह

سنجے نے کہا—اے بزرگ! اس نے نکُل کو تہتر تیروں سے اور دروپدی کے بیٹوں کو ایک ایک کر کے پانچ پانچ تیروں سے گھائل کر کے پھر ہولناک للکار بلند کی۔

Verse 16

त॑ भीमसेनो नवभि: सहदेवस्तु पठ्चभि: । युधिष्ठिर: शतेनैव राक्षसं प्रत्यविध्यत,तब भीमसेनने नौ, सहदेवने पाँच और युधिष्छिरने सौ बाणोंसे राक्षस अलम्बुषको घायल कर दिया

سنجے نے کہا—بھیم سین نے نو تیروں سے، سہ دیو نے پانچ تیروں سے اور یدھشٹھِر نے پورے سو تیروں سے راکشس اَلمبُش کو زخمی کر دیا۔

Verse 17

नकुलस्तु चतु:षष्ट्या द्रौपदेयास्त्रिभिस्त्रिभि: । हैडिम्बो राक्षसं विद्ध्वा युद्धे पड्चाशता शरै:

سنجے نے کہا—نکُل نے میدانِ جنگ میں راکشس ہَیڈِمب کو چونسٹھ تیروں سے چھیدا، اور دروپدی کے بیٹوں نے اسے تین تین تیروں سے وِدھ کیا۔

Verse 18

तस्य नादेन महता कम्पितेयं वसुंधरा

اس کے عظیم نعرے سے یہ زمین لرز اٹھی۔

Verse 19

सपर्वतवना राजन्‌ सपादपजलाशया | राजन्‌! उसके महान्‌ सिंहनादसे वृक्षों, जलाशयों, पर्वतों और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी काँप उठी ।। सो5तिविद्धो महेष्वासै: सर्वतस्तैर्महारथै:

سنجے نے کہا—اے راجن! اُس کے اُس عظیم شیرنعرے سے پہاڑوں، جنگلوں، درختوں اور آبی ذخائر سمیت ساری زمین لرز اُٹھی۔ اور وہ مہا کماندار، کمان کے ماہر اُن مہارَتھیوں کے ہاتھوں ہر سمت سے تیروں سے چھید دیا گیا۔

Verse 20

तंक्रुद्धं राक्षसं युद्धे प्रतिक्रुद्धस्तु राक्षस:

سنجے نے کہا—میدانِ جنگ میں اُس غضبناک راکشس کے مقابل ایک اور راکشس آیا، جو بدلے کے غضب میں اسی طرح بھڑک اٹھا۔

Verse 21

सो5तिविद्धो बलवता राक्षसेन्द्रोी महाबल:

سنجے نے کہا—وہ مہابلی راکشسوں کا سردار ایک زبردست وار سے آرپار چھید دیا گیا۔

Verse 22

व्यसृजत्‌ सायकांस्तूर्ण रुक्मपुड्खान्‌ शिलाशितान्‌ | बलवान घटोत्कचद्वारा अत्यन्त क्षत-विक्षत होकर उस महाबली राक्षसराजने तुरंत ही सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।।

سنجے نے کہا—تب اُس نے فوراً سونے کے پروں والے، پتھر پر تیز کیے ہوئے تیر برسائے۔ وہ تیر، زورِ ضرب سے جوڑوں پر جھک کر، اسی لمحے اس راکشس کے جسم میں پیوست ہو گئے۔

Verse 23

ततस्ते पाण्डवा राजन्‌ समन्तान्निशितान्‌ शरान्‌

سنجے نے کہا—پھر، اے راجن، پانڈوؤں نے ہر سمت سے تیز و تند، نوکیلے تیر برسائے۔

Verse 24

स विध्यमान: समरे पाण्डवैर्जितकाशिभि:

سنجے نے کہا: میدانِ جنگ میں کاشی کو فتح کرنے والے پانڈوؤں کے وار سے وہ چھلنی ہو رہا تھا۔

Verse 25

तत: समरशौण्डो वै भैमसेनिर्महाबल:

سنجے نے کہا: پھر مہابلی بھیم سین، جو جنگ کا شوقین تھا، مقابلے کے لیے آگے بڑھا۔

Verse 26

वेग॑ चक्रे महान्तं च राक्षसेन्द्ररथं प्रति

سنجے نے کہا: اس نے زبردست رفتار پکڑی اور راکشسوں کے سردار کے رتھ کی طرف لپکا۔

Verse 27

रथाद्‌ रथमभिद्र॒त्य क्रुद्धों हैडिम्बिराक्षिपत्‌

سنجے نے کہا: غصّے میں وہ رتھ سے رتھ پر جھپٹا اور ہَیڈِمب ہتھیار پھینک دیا۔

Verse 28

समुत्क्षिप्प च बाहुभ्यामाविध्य च पुनः पुन:

سنجے نے کہا: اسے دونوں بازوؤں سے اٹھا کر وہ بار بار گھمانے لگا۔

Verse 29

बललाघवसम्पन्न: सम्पन्नो विक्रमेण च

سنجے نے کہا—وہ قوت اور چابک دستی سے آراستہ تھا، اور شجاعت و دلیری میں بھی کامل تھا۔

Verse 30

स विस्फारितसर्वाड्रिश्ूर्णितास्थिविंभीषण:

سنجے نے کہا—وہ نہایت ہولناک دکھائی دیتا تھا؛ گویا پہاڑ شق ہو گیا ہو—ہڈیاں چکناچور، منظر نہایت بھیانک۔

Verse 31

ततः सुमनस:ः पार्था हते तस्मिन्‌ निशाचरे

پھر جب وہ شب رو دشمن مارا گیا تو پرتھا کے بیٹے دل سے خوش ہو گئے۔

Verse 32

तावकाश्च हत॑ दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रे महाबलम्‌,भरतश्रेष्ठ! टूट-फ़ूटकर गिरे हुए पर्वतके समान महाबली राक्षसराज अलम्बुषको मारा गया देख आपके शूरवीर योद्धा तथा उनकी सारी सेनाएँ हाहाकार करने लगीं

سنجے نے کہا—اے بھرت شریشٹھ! جب تمہارے سورماؤں نے طاقتور راکشسوں کے سردار، المبوُش کو ٹوٹے ہوئے پہاڑ کی مانند گرا ہوا اور مارا گیا دیکھا تو تمہارے بہادر جنگجو اور پوری فوج ہاہاکار کرنے لگی۔

Verse 33

यादृगेव पुरा वृत्तं रामरावणयो: प्रभो । अलम्बुषने अत्यन्त कुपित होकर घटोत्कचको घायल कर दिया। वे दोनों राक्षस समाजके मुखिया थे। प्रभो! जैसे पूर्वकालमें श्रीराम और रावणका संग्राम हुआ था

سنجے نے کہا—اے مولا! جیسے قدیم زمانے میں رام اور راون کا سنگرام ہوا تھا، ویسا ہی ان دونوں راکشس سرداروں کے درمیان بھی ہولناک جنگ چھڑ گئی۔ المبوُش حد درجہ غضبناک ہو کر گھٹو تکچ کو زخمی کر گیا۔ پھر، اے بھرت-رشبھ، جب ٹوٹے ہوئے پہاڑ کی مانند بہادر المبوُش کو مارا ہوا دیکھا گیا تو لشکروں میں ہاہاکار مچ گیا۔

Verse 34

जनाश्च तद्‌ ददृशिरे रक्ष: कौतूहलान्विता: । यदृ्च्छया निपतितं भूमावज्भारकं यथा,पृथ्वीपर अकस्मात्‌ टूटकर गिरे हुए मंगल ग्रहके समान धराशायी हुए उस राक्षसको बहुत-से मनुष्य कौतूहलवश देखने लगे

سنجے نے کہا—تجسّس میں مبتلا بہت سے لوگ جمع ہو کر اُس راکشس کو دیکھنے لگے جو محض اتفاق سے زمین پر گرا پڑا تھا، گویا کوئی بھاری بوجھ اچانک زمین پر آن گرا ہو۔

Verse 35

घटोत्कचस्तु तद्धत्वा रक्षो बलवतां वरम्‌ | मुमोच बलवतन्नादं बल॑ हत्वेव वासव:

سنجے نے کہا—طاقتوروں میں سب سے برتر راکشس، الَمبُش، کو قتل کر کے گھٹو تکچ نے گرج دار نعرہ بلند کیا؛ جیسے واسَوَ (اندَر) نے بَلا دیو کو مار کر گرجا تھا۔

Verse 36

(ततो5भिगम्य राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । स्वकमविदयमन्मूर्थधना साञउ्जलिनिपपात ह ।।

سنجے نے کہا—اس کے بعد گھٹو تکچ دھرم پُتر راجا یُدھشٹھِر کے پاس گیا۔ ہاتھ جوڑ کر، سر جھکا کر اس نے اپنا کارنامہ عرض کیا اور بادشاہ کے قدموں میں گر پڑا۔ جَیَشٹھ پاندَو یُدھشٹھِر نے خوشی سے اس کے سر کو محبت سے سونگھا، اسے سینے سے لگایا اور کہا—“بیٹے! میں تم سے بہت خوش ہوں”؛ فرطِ مسرت سے اس کی آنکھیں کھِل اٹھیں۔ جب شالکٹنکٹ کا بیٹا، شب گرد راکشس الَمبُش، گھٹو تکچ کے ہاتھوں زمین پر رگڑ کر کچلا جا کر مارا گیا تو سب لوگ شادمان ہو گئے۔ پاندَو پِتروں اور رشتہ داروں کی طرف سے عزت و ستائش پا کر، اس دشوار کارنامے کو سرانجام دے کر اور دشمن کو قتل کر کے گھٹو تکچ نے ایسی مسرت پائی جیسے پکا ہوا الَمبُش پھل توڑ ڈالا گیا ہو۔

Verse 37

ततो निनाद: सुमहान्‌ समुत्थित: सशड्खनानाविधबाणघोषवान्‌ | निशम्य त॑ प्रत्यनदंस्तु पाण्डवा- स्‍्ततो ध्वनिर्भुवनमथास्पृशद्‌ भूशम्‌

سنجے نے کہا—پھر شنکھوں کی گونج اور طرح طرح کے تیروں کی سنسناہٹ کے ساتھ ایک نہایت عظیم نعرہ بلند ہوا۔ اسے سن کر پاندَو خوشی سے جواب میں جے دھونی کرنے لگے؛ اور وہ فتح کی صدا چاروں طرف دنیا میں دور تک پھیل گئی۔

Verse 53

विद्ध्वा विद्ध्वा नदद्धृष्ट:पूरयन्‌ खं समन्ततः । राजन! इसी प्रकार अलम्बुष भी युद्धदुर्मद घटोत्कचको बारंबार घायल करके समूचे आकाशको हर्षपूर्वक गुँजाता हुआ सिंहनाद करता था

سنجے نے کہا—بار بار زخمی کر کے بھی وہ دلیرانہ گرجتا اور چاروں طرف آسمان کو بھر دیتا تھا۔ اے راجن! اسی طرح الَمبُش بھی جنگ کے جوش میں بپھرے ہوئے گھٹو تکچ کو بار بار زخمی کر کے خوشی سے سِنگھناد کرتا، اور سارے فلک کو گونجا دیتا تھا۔

Verse 63

निर्विशेषमयुध्येतां मायाभिरितरेतरम्‌ । इस प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए वे दोनों महाबली राक्षसराज परस्पर मायाओंको प्रयोग करते हुए समानरूपसे युद्ध करने लगे

سنجے نے کہا—شدید غضب سے مغلوب وہ دونوں زبردست راکشس راجا ایک دوسرے کے مقابل بے امتیاز، مایا اور فریب کی تدبیروں سے جنگ کرنے لگے۔ ہر ایک دوسرے کی مایا کو مایا ہی سے توڑتا رہا، اور ہولناک معرکہ برابر کی قوت کے ساتھ قائم رہا۔

Verse 76

मायायुद्धेषु कुशलौ मायायुद्धमयुध्यताम्‌ । वे प्रतिदिन सैकड़ों मायाओंकी सृष्टि करनेवाले थे और दोनों ही मायायुद्धमें कुशल थे। अतः एक-दूसरेको मोहित करते हुए मायाद्वारा ही युद्ध करने लगे

سنجے نے کہا—مایا کے معرکوں میں ماہر وہ دونوں مایا ہی کے ذریعے ایک دوسرے سے لڑنے لگے۔ وہ روزانہ سینکڑوں فریب و سراب پیدا کرتے اور ایک دوسرے کو مسحور کرنے کی کوشش کرتے؛ مایا سے مایا کو توڑتے ہوئے جنگ جاری رہی۔

Verse 96

अलम्बुषं राक्षसेन्द्रं दृष्टवाक्रुध्यन्त पाण्डवा: | मायायुद्धविशारद राक्षसराज अलम्बुषको इस प्रकार युद्ध करते देख समस्त पाण्डव कुपित हो उठे

سنجے نے کہا—جب پاندَووں نے راکشسوں کے سردار، مایا-یُدھ میں ماہر اَلمبُش کو اس انداز سے لڑتے دیکھا تو سب کے سب غضب سے بھر اٹھے۔

Verse 103

अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धा भीमसेनादयो नृप । राजन! वे अत्यन्त उद्विग्न हुए भीमसेन आदि श्रेष्ठ वीर क्रोधमें भरकर रथोंद्वारा सब ओरसे अलम्बुषपर टूट पड़े

سنجے نے کہا—اے بادشاہ! غصّے سے بھڑکے ہوئے بھیم سین اور دوسرے برگزیدہ سورما سخت بے قرار ہو اٹھے، اور رتھوں پر سوار ہو کر ہر سمت سے اَلمبُش پر ٹوٹ پڑے۔

Verse 109

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अलम्बुषवधे नवाधिकशततमोड<ध्याय:

یہاں شری مہابھارت کے دروṇ پَرو میں، جَیَدرتھ وَدھ پَرو کے ضمن میں، اَلمبُش وَدھ سے متعلق ایک سو نوواں باب اختتام کو پہنچا۔

Verse 123

तस्माद्‌ रथव्रजान्मुक्तो वनदाहादिव द्विप: । उस समय अलम्बुष अपने अस्त्रोंकी मायासे उनके उस महान्‌ अस्त्रवेगको दबाकर रथसमूहके उस घेरेसे मुक्त हो गया, मानो कोई गजराज दावानलके घेरेसे बाहर हो गया हो

سنجے نے کہا—پس وہ رتھوں کے جمگھٹے کے گھیرے سے چھوٹ کر جنگل کی آگ سے نکلنے والے عظیم ہاتھی کی مانند باہر نکل گیا۔ الَمبُش نے اپنے اسلحی فریب سے اُس مہااستر کے زور کو دبا دیا اور رتھوں کے اس محاصرے سے آزاد ہو گیا—گویا دَوانَل کے حلقے سے گجراج نکل آیا ہو۔

Verse 133

मारुतिं पञ्चविंशत्या भैमसेनिं च पठ्चभि: । उसने इन्द्रके वज्ञकी भाँति घोर टंकार करनेवाले अपने भयंकर धनुषको तानकर भीमसेनको पचीस और उनके पुत्र घटोत्कचको पाँच बाण मारे

سنجے نے کہا—اس نے اپنا ہولناک کمان کھینچا جو اندَر کے وَجر کی مانند ہیبت ناک گرجتا تھا، اور بھیم سین کو پچیس تیروں سے اور بھیم کے بیٹے گھٹوتکچ کو پانچ تیروں سے چھید ڈالا۔

Verse 173

पुनर्विव्याध सप्तत्या ननाद च महाबल: । तत्पश्चात्‌ नकुलने चौंसठ और द्रौपदीकुमारोंने तीन-तीन बाणोंसे अलम्बुषको बींध डाला। तदनन्तर महाबली हिडिम्बाकुमारने युद्धस्थलमें उस राक्षसको पचास बाणोंसे घायल करके पुनः सत्तर बाणोंद्वारा बींध डाला और बड़े जोरसे गर्जना की

پھر اس مہابلی نے دوبارہ ستر تیروں سے چھیدا اور زور سے للکارا۔ اس کے بعد نکُل نے چونسٹھ تیروں سے اور دروپدی کے بیٹوں نے تین تین تیروں سے الَمبُش کو بیندھ ڈالا۔ پھر ہڈِمبا کے بیٹے گھٹوتکچ نے میدانِ جنگ میں اس راکشس کو پچاس تیروں سے زخمی کیا اور دوبارہ ستر تیروں سے چھید دیا، اور بلند آواز سے گرج اٹھا۔

Verse 196

प्रतिविव्याध तान्‌ सर्वान्‌ पज्चभि: पज्चभि: शरै: | उन महाधनुर्थर महारथियोंद्वारा सब ओरसे अत्यन्त घायल होकर बदलेमें अलम्बुषने भी पाँच-पाँच बाणोंसे उन सबको वेध दिया

ان مہادھنوردھر مہارَتھیوں نے اسے ہر طرف سے سخت زخمی کیا، پھر بھی جواباً الَمبُش نے اُن سب کو پانچ پانچ تیروں سے چھید ڈالا۔

Verse 203

हैडिम्बो भरतश्रेष्ठ शरैरविव्याध सप्तभि: । भरतश्रेष्ठ) उस युद्धस्थलमें कुपित हुए राक्षस अलम्बुषको क्रोधमें भरे हुए निशाचर घटोत्कचने सात बाणोंसे घायल कर दिया

اے بھرت شریشٹھ! میدانِ جنگ میں غضب سے بھرے نِشَچَر ہَیڈِمب گھٹوتکچ نے خشمگیں راکشس الَمبُش کو سات تیروں سے چھید کر زخمی کر دیا۔

Verse 226

रुषिता: पन्नगा यद्धद्‌ गिरिशूड़ं महाबला: । जैसे रोषमें भरे हुए महाबली सर्प पर्वतसे शिखरपर चढ़ जाते हैं, उसी प्रकार अलम्बुषके वे झुकी हुई गाँठवाले बाण उस समय घटोत्कचके शरीरमें घुस गये

سنجے نے کہا—جیسے غضب سے بھرے ہوئے طاقتور سانپ پہاڑ کی چوٹی پر چڑھ جاتے ہیں، ویسے ہی اُس وقت الَمبُوش کے گرہ دار، نیچے کو جھکے ہوئے تیر گھٹوتکچ کے جسم میں پیوست ہو گئے۔

Verse 233

प्रेषयामासुरुद्धिग्ना हैडिम्बश्न घटोत्कच: । राजन्‌! तदनन्तर पाण्डव तथा हिडिम्बाकुमार घटोत्कच--सबने उद्विग्न होकर सब ओरसे अलम्बुषपर पैने बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी

سنجے نے کہا—گھبرا کر ہَیڈِمب گھٹوتکچ نے حملہ چھیڑ دیا۔ پھر، اے راجن، اس کے فوراً بعد پانڈو—ہڈِمبا کے بیٹے گھٹوتکچ کے ساتھ—چاروں طرف سے الَمبُوش پر تیز تیروں کی لگاتار بارش کرنے لگے۔

Verse 243

मर्त्यधर्ममनुप्राप्त: कर्तव्यं नानवपद्यत | विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा समरभूमिमें विद्ध होकर मर्त्यधर्मको प्राप्त हुए अलम्बुषसे कुछ भी करते न बना

سنجے نے کہا—مَرتیہ دھرم کو پہنچا ہوا الَمبُوش اب اپنا فرض ادا کرنے کے قابل نہ رہا۔ فتح سے سرشار پانڈوؤں نے میدانِ جنگ میں اسے زخمی کر دیا؛ وہ فانیوں کی تقدیر کو پہنچا اور پھر کچھ بھی کرنے سے عاجز ہو گیا۔

Verse 253

समीक्ष्य तदवस्थं तं वधायास्य मनो दे | तब समरकुशल महाबली भीमसेनकुमारने अलम्बुषको उस अवस्थामें देखकर मन-ही- मन उसके वधका निश्चय किया

سنجے نے کہا—اس کی وہ حالت دیکھ کر، جنگ میں ماہر اور نہایت طاقتور بھیم سین کے بیٹے نے دل ہی دل میں الَمبُوش کے قتل کا پختہ ارادہ کر لیا۔

Verse 266

दग्धाद्रिकूटशृज्ञाभं भिन्नाउजजनचयोपमम्‌ । उसने जले हुए पर्वतशिखर तथा कटे-छटे कोयलेके पहाड़के समान प्रतीत होनेवाले राक्षसराज अलम्बुषके रथपर पहुँचनेके लिये महान्‌ वेग प्रकट किया

سنجے نے کہا—جلے ہوئے پہاڑی شِکھر کی مانند اور ٹوٹے ہوئے سرمئی سیاہ پتھروں کے ڈھیر جیسا دکھائی دینے والے راکشس راج الَمبُوش کے رتھ تک پہنچنے کے لیے اس نے بے پناہ رفتار ظاہر کی۔

Verse 273

उदबबर्ह रथाच्चापि पन्नगं गरुडो यथा । क्रोधमें भरे हुए हिडिम्बाकुमारने अपने रथसे अलम्बुषके रथपर कूदकर उसे पकड़ लिया और जैसे गरुड़ सर्पको टाँग लेता है, उसी प्रकार उसने भी अलम्बुषको रथसे उठा लिया

سنجے نے کہا—جنگی غضب سے بھرے ہوئے ہڈمبا کے بیٹے نے اپنے رتھ سے چھلانگ لگا کر الَمبُش کے رتھ پر جا اسے پکڑ لیا، اور جیسے گرُڑ سانپ کو جھپٹ کر اٹھا لیتا ہے ویسے ہی اس نے الَمبُش کو رتھ سے اٹھا لیا۔

Verse 283

निष्पिपेष क्षितौ क्षिप्र॑ पूर्णकुम्भमिवाश्मनि । दोनों भुजाओंसे अलम्बुषको ऊपर उठाकर घटोत्कचने बारंबार घुमाया और जैसे जलसे भरे हुए घड़ेको पत्थरपर पटक दिया जाय, उसी प्रकार उसे शीघ्र ही पृथ्वीपर दे मारा

سنجے نے کہا—گھٹوتکچ نے دونوں بازوؤں سے الَمبُش کو اوپر اٹھا کر بار بار گھمایا، پھر جیسے پانی سے بھرا گھڑا پتھر پر پٹخا جاتا ہے ویسے ہی اسے فوراً زمین پر دے مارا۔

Verse 303

घटोत्कचेन वीरेण हत: शालकटड्कट: । वीर घटोत्कचके द्वारा मारे गये शालकटंकटाके पुत्र अलम्बुषके सारे अंग फट गये थे। उसकी हडियाँ चूर-चूर हो गयी थीं और वह बड़ा भयंकर दिखायी देता था

سنجے نے کہا—دلیر گھٹوتکچ نے شالکٹنکٹ کو قتل کر دیا۔ اس کے بیٹے الَمبُش کے بھی سارے اعضا پھٹ گئے، ہڈیاں چور چور ہو گئیں؛ وہ نہایت ہولناک صورت میں پڑا تھا۔

Verse 316

चुक्रुशु: सिंहनादांश्व वासांस्यादुधुवुश्च ह । उस निशाचर अल्म्बुषके मारे जानेपर कुन्तीके सभी पुत्र प्रसन्नचित्त हो सिंहनाद करने और वस्त्र हिलाने लगे

سنجے نے کہا—جب وہ شب رو الَمبُش مارا گیا تو کنتی کے سب بیٹے خوش دل ہو گئے؛ انہوں نے شیر کی دھاڑ جیسے نعرے لگائے اور مسرت میں اپنے کپڑے لہرانے لگے۔

Verse 2936

भैमसेनी रणे क्रुद्ध: सर्वसैन्यान्य भीषयत्‌ । घटोत्कचमें बल और फुर्ती दोनों विद्यमान थे। वह अद्भुत पराक्रमसे सम्पन्न था। उसने रणक्षेत्रमें कुपित होकर आपकी समस्त सेनाओंको भयभीत कर दिया

سنجے نے کہا—میدانِ جنگ میں غضبناک ہو کر بھیم سین کے بیٹے نے تمام لشکروں پر دہشت طاری کر دی۔ گھٹوتکچ میں قوت بھی تھی اور پھرتی بھی؛ وہ عجیب و غریب شجاعت سے آراستہ ہو کر رزم گاہ میں بپھر اٹھا اور تمہارے پورے لشکر کو لرزا دیا۔

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dilemma of duty under grief: Karṇa’s rage and despair push him toward immediate violent redress, while the narrative simultaneously shows how such responses intensify collective harm and entangle personal vows with wider responsibility.

Agency remains operative even amid extreme emotion: the text illustrates how disciplined choices (methodical counter-tactics, restraint in sequencing actions) can redirect outcomes, whereas affect-dominant decisions amplify suffering and reduce strategic clarity.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative-ethical documentation, using simile-rich description and observed reactions to imply interpretive lessons about consequence, reputation, and the costs of retaliatory escalation.

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