Mahabharata Adhyaya 102
Drona ParvaAdhyaya 10239 Versesपाण्डव-पक्ष के पक्ष में गति और मनोबल; कौरव सेना में विस्मय व अव्यवस्था, जयद्रथ की रक्षा-रेखा पर दबाव बढ़ता हुआ।

Adhyaya 102

धर्मराजस्य चिन्ता, भीमसेनप्रेषणम्, द्रोणानीकप्रवेशप्रयत्नः (Yudhiṣṭhira’s Anxiety and the Dispatch of Bhīma; Attempted Breakthrough into Droṇa’s Formation)

Upa-parva: Bhīmasena–Droṇa-pratisaṃyoga (Strategic engagement of Bhīma with Droṇa’s array)

Saṃjaya reports that as formations churn and the battle grows increasingly severe, Yudhiṣṭhira cannot locate Arjuna or Kṛṣṇa and also does not see Sātyaki, producing a crisis of situational awareness. Weighing the ethical risk of neglecting Sātyaki against the urgent need to reestablish contact with Arjuna’s movement, Yudhiṣṭhira resolves to send Bhīma along their difficult route while ensuring his own protection. He approaches Bhīma with visible distress, interprets the sound of Pāñcajanya as a sign of intense combat around Arjuna, and frames his fear as both personal grief and operational concern. Bhīma accepts the command, coordinates with Dhṛṣṭadyumna regarding the king’s defense, and departs in martial readiness. The chapter then shifts to Bhīma’s advance: Kaurava warriors attempt to encircle and delay him; Bhīma counters, breaks through units (including elephant contingents), and engages Droṇa directly. Droṇa blocks Bhīma’s entry, prompting Bhīma’s forceful reply and escalation. Bhīma damages Droṇa’s chariot, disperses opposing fighters, defeats multiple named adversaries, routs the surrounding rathin forces, and resumes his push toward Droṇa’s sector, marking a tactical breakthrough attempt amid a broader effort to reach Arjuna and Sātyaki.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है—रणभूमि में एक अद्भुत, पहले कभी न देखा गया दृश्य घटा: अर्जुन के रथ के लिए जल का प्राकट्य, और कृष्ण का रथ से उतरकर घोड़ों को बाणों की पीड़ा से छुड़ाना। → चारों ओर रथ-समूह, हाथी-घोड़े और शस्त्र-वर्षा अर्जुन पर टूट पड़ते हैं; धूल इतनी उड़ती है कि सूर्य तक ढँक जाता है और घायल योद्धा कृष्ण-अर्जुन को ठीक से देख भी नहीं पाते। फिर भी अर्जुन शत्रु-प्रहारों को ऐसे ‘ग्रस’ लेता है जैसे समुद्र नदियों को। इस असंभव-सा धैर्य और गति देखकर सिद्ध-चारण और सैनिकों में साधुवाद उठता है—पर कौरव पक्ष में विस्मय के साथ भय भी बढ़ता है कि जयद्रथ तक पहुँचने से उन्हें कौन रोक पाएगा। → कृष्ण जलाशय/जल-प्रबंध के सहारे घोड़ों को पानी पिलाते, स्नान कराते, चारा-दाना खिलाते और फिर उसी क्षण उन्हें रथ में जोतकर रथ को आगे बढ़ा देते हैं—यह ‘रण के बीच विश्राम’ नहीं, बल्कि विजय-यात्रा का निर्णायक पुनर्संयोजन है; कौरव सैनिक देखते-देखते कहते हैं कि ये दोनों धनुर्धारियों की आँखों के सामने ही जयद्रथ की ओर बढ़ रहे हैं और हमारी सेना को रौंदते जा रहे हैं। → अध्याय का फल यह बनता है कि पाण्डव-पक्ष की गति और मनोबल स्थिर हो जाता है—अर्जुन का रथ फिर से पूर्ण वेग में है; कौरव सेना में ‘सैन्य-विस्मय’ फैलता है, और युद्ध का प्रवाह जयद्रथ-वध की ओर और अधिक अनिवार्य प्रतीत होने लगता है। → धूल-आवरण और रण-कोलाहल के बीच कृष्ण-अर्जुन का रथ जयद्रथ की दिशा में बढ़ चुका है—अब प्रश्न यह है कि क्या कौरव-व्यूह इस वेग को रोक पाएगा, या जयद्रथ का अंत निकट है?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें विन्द और अनुविन्दका वध तथा अर्जुनके द्वार जलाशयका निर्माणविषयक निन्‍्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९९ ॥/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ “लोक मिलाकर कुल ६४ ३ “लोक हैं) #द१०3८5>> | बी है शततमो< ध्याय: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना संजय उवाच सलिले जनिते तस्मिन्‌ कौन्तेयेन महात्मना । निस्तारिते द्विषत्सैन्ये कृते च शरवेश्मनि

سنجے نے کہا—اے راجن! جب عظیم النفس کُنتی پُتر ارجن نے پانی پیدا کر دیا، دشمن لشکر کی پیش قدمی روک دی اور تیروں کا ایک حفاظتی گھر بنا دیا، تب عظیم جلال والے بھگوان شری کرشن فوراً رتھ سے اترے اور بگلے کے پروں والے تیروں سے زخمی گھوڑوں کو جوئے سے کھول دیا۔

Verse 2

वासुदेवो रथात्‌ तूर्णमवतीर्य महाद्युति: । मोचयामास तुरगान्‌ विनुन्नान्‌ कड़कपत्रिभि:

سنجے نے کہا—اے راجن! تب عظیم نور والے واسودیو تیزی سے رتھ سے اترے اور بگلے کے پروں والے تیروں سے زخمی گھوڑوں کو جوئے سے آزاد کر دیا۔

Verse 3

अदृष्टपूर्व तद्‌ दृष्टवा साधुवादों महानभूत्‌ । सिद्धचारणसंघानां सैनिकानां च सर्वश:,यह अदृष्टपूर्व कार्य देखकर सिद्ध, चारण तथा सैनिकोंके मुखसे निकला हुआ महान्‌ साधुवाद सब ओर गूँज उठा

اس بےسابقہ کارنامے کو دیکھ کر سِدھوں، چارنوں اور تمام سپاہیوں کی زبان سے “سाधु! साधु!” کی عظیم داد و تحسین ہر طرف گونج اٹھی۔

Verse 4

पदातिन तु कौन्तेयं युध्यमानं महारथा: । नाशवनुवन्‌ वारयितुं तदद्भुतमिवाभवत्‌,पैदल युद्ध करते हुए कुन्तीकुमार अर्जुनको समस्त महारथी मिलकर भी न रोक सके; यह अद्भुत-सी बात हुई

پیدل ہو کر لڑتے ہوئے بھی کُنتی پُتر ارجن کو تمام مہارथّی مل کر نہ روک سکے؛ یہ گویا ایک عجوبہ سا معلوم ہوا۔

Verse 5

आपतत्सु रथौधेषु प्रभूतगजवाजिषु । नासम्भ्रमत्‌ तदा पार्थस्तदस्य पुरुषानति

جب رتھوں کے گھنے جھنڈ اور بہت سے ہاتھی اور گھوڑے ہر طرف سے ٹوٹ پڑے، تب بھی اس وقت پارتھ ارجن ذرا بھی مضطرب نہ ہوا؛ اس کی ثابت قدمی اور شجاعت سب انسانوں سے بڑھ کر تھی۔

Verse 6

व्यसृजन्त शरौघांस्ते पाण्डवं प्रति पार्थिवा: । न चाव्यथत धर्मात्मा वासवि: परवीरहा

ان بادشاہوں نے پاندَو کے خلاف تیروں کی جھڑیاں برسا دیں؛ مگر دھرماتما، واسوی پُتر، دشمن بہادروں کا قاتل، ذرا بھی نہ ڈگمگایا۔

Verse 7

सम्पूर्ण भूपाल पाण्डुनन्दन अर्जुनपर बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहे थे, तो भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रकुमार धर्मात्मा पार्थ तनिक भी व्यथित नहीं हुए ।।

جب سب کے سب بادشاہ پاندو کے بیٹے ارجن پر تیروں کی بارش برسا رہے تھے، تب بھی دشمن کے بہادروں کا قتال کرنے والا، اندرا کا بیٹا، دھرماتما پارتھ ذرا بھی مضطرب نہ ہوا۔ وہ زورآور پارتھ آنے والے تیروں کے جال کو، اور گداؤں اور نیزوں کو بھی، یوں نگل گیا جیسے سمندر دریاؤں کو اپنے اندر سمو لیتا ہے۔

Verse 8

उन पराक्रमी कुन्तीकुमारने शत्रुओंके उन बाणसमूहों, गदाओं और प्रासोंको अपने पास आनेपर उसी प्रकार ग्रस लिया, जैसे समुद्र सरिताओंको अपनेमें मिला लेता है ।।

پارتھ (ارجن) نے اپنے ہتھیاروں کے عظیم زور اور بازوؤں کی قوت سے تمام شاہانِ ارض کے بہترین تیروں کو نگل کر بالکل بے اثر کر دیا۔

Verse 9

तत्‌ तु पार्थस्य विक्रान्तं वासुदेवस्थ चो भयो: । अपूजयन्‌ महाराज कौरवा महदद्भुतम्‌,महाराज! अर्जुन और भगवान्‌ श्रीकृष्ण दोनोंके उस अत्यन्त अद्भुत पराक्रमकी समस्त कौरवोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की

اے مہاراج! پارتھ اور واسودیو—دونوں کے اُس نہایت عجیب و غریب شجاعانہ کارنامے کی تمام کوروؤں نے کھلے دل سے داد دی۔

Verse 10

किमद्धुततमं लोके भविताप्यथवा हाभूत्‌ । यदश्वान्‌ पार्थगोविन्दौ मोचयामासतू रणे

اس دنیا میں اس سے بڑھ کر اور کیا عجوبہ ہوگا—خواہ آئندہ ہو یا پہلے ہو چکا ہو—کہ پارتھ اور گووند نے اُس ہولناک جنگ کے بیچ ہی رتھ سے گھوڑے کھول دیے!

Verse 11

भयं विपुलमस्मासु तावधत्तां नरोत्तमौ | तेजो विदधतुश्चोग्रं विस्रब्धौ रणमूर्थनि

ان دونوں نرश्रेष्ठوں نے ہماری صفوں میں عظیم خوف پیدا کر دیا؛ اور میدانِ جنگ کے عین اگلے محاذ پر بےخوف اور بےفکر کھڑے ہو کر انہوں نے اپنا سخت و ہیبت ناک جلال ظاہر کیا۔

Verse 12

उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंने हमलोगोंमें महान्‌ भय उत्पन्न कर दिया और युद्धके मुहानेपर निर्भय और निश्चिन्त होकर अपने भयानक तेजका प्रदर्शन किया ।।

ان دونوں نرश्रेष्ठ بہادروں نے ہماری صفوں میں عظیم خوف بھر دیا اور جنگ کے دہانے پر بےخوف اور بےفکر ہو کر اپنا ہولناک جلال دکھایا۔ پھر، اے بھارت! میدانِ کارزار میں ارجن کے بنائے ہوئے تیر-ساختہ آشیانے کے اندر ہریشیکیش (شری کرشن) مسکراتے ہوئے یوں کھڑے تھے گویا عورتوں کے درمیان ہوں—جنگ کی ہولناکی میں بھی سراسر بےخوف۔

Verse 13

उपावर्तयदव्यग्रस्तान श्वान्‌ पुष्करेक्षण: । मिषतां सर्वसैन्यानां त्वदीयानां विशाम्पते,प्रजानाथ! कमलनयन श्रीकृष्णने आपके सम्पूर्ण सैनिकोंके देखते-देखते उद्धेगशून्य होकर उन घोड़ोंकोी टहलाया

اے رعایا کے مالک، اے بادشاہ! پُشکرےکشن (کنول نین) شری کرشن نے تمہارے تمام لشکر کے دیکھتے دیکھتے، بےاضطراب رہ کر، اُن گھوڑوں کو موڑ کر چلایا۔

Verse 14

तेषां श्रमं च ग्लानिं च वमथुं वेपथुं व्रणान्‌ । सर्व व्यपानुदत्‌ कृष्ण: कुशलो हाश्वकर्मणि,घोड़ोंकी चिकित्सा करनेमें कुशल श्रीकृष्णने उनके परिश्रम, थकावट, वमन, कम्पन और घाव--सारे कष्टोंको दूर कर दिया

گھوڑوں کی دیکھ بھال میں ماہر شری کرشن نے اُن کی مشقت، نڈھالی، متلی و قے، کپکپی اور زخم—سبھی تکلیفیں دور کر دیں۔

Verse 15

शल्यानुद्धृत्य पाणिभ्यां परिमृज्य च तान्‌ हयान्‌ । उपावर्त्य यथान्यायं पाययामास वारि स:,उन्होंने अपने दोनों हाथोंसे बाण निकालकर उन घोड़ोंको मला और यथोचित रूपसे टहलाकर उन्हें पानी पिलाया

اس نے اپنے دونوں ہاتھوں سے تیروں کے پھل نکالے، اُن گھوڑوں کو نرمی سے سہلایا؛ پھر مناسب طریقے سے موڑ کر چہلایا اور انہیں پانی پلایا۔

Verse 16

स ताल्लब्धोदकान्‌ स्नातान्‌ जग्धान्नान्‌ विगतक्‍्लमान्‌ | योजयामास संदृष्ट: पुनरेव रथोत्तमे

اس نے دیکھا کہ گھوڑوں نے پانی پا لیا ہے، انہیں نہلا دیا گیا ہے، انہوں نے چارہ اور دانہ کھا لیا ہے اور ان کی تھکن دور ہو گئی ہے؛ تب اس نے خوش دلی سے انہیں پھر اسی بہترین رتھ میں جوت دیا۔

Verse 17

स तं रथवरं शौरि: सर्वशस्त्रभृतां वर: । समास्थाय महातेजा: सार्जुन: प्रययौ द्रुतम्‌,तदनन्तर सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी श्रीकृष्ण उस उत्तम रथपर अर्जुनसहित आरूढ़ हो बड़े वेगसे आगे बढ़े

پھر تمام اسلحہ برداروں میں سب سے برتر، عظیم جلال والے شَوری (شری کرشن) ارجن کے ساتھ اس بہترین رتھ پر سوار ہو کر نہایت تیزی سے آگے بڑھے۔

Verse 18

रथं रथवरस्याजोौ युक्त लब्धोदकैर्हयै: । दृष्टवा कुरुबलश्रेष्ठा: पुनर्विमनसो5भवन्‌

میدانِ جنگ میں پانی پا کر تازہ دم گھوڑوں سے جُتا ہوا، رتھیوں میں سب سے برتر ارجن کا رتھ دیکھ کر کورو لشکر کے نامور سورما پھر سے دل گرفتہ ہو گئے۔

Verse 19

विनिः:श्वसन्तस्ते राजन्‌ भग्नदंष्टा इवोरगा: । धिगहो धिग्गतः पार्थ: कृष्णश्रेत्यब्रुवन्‌ पृथक्‌

اے راجن، ٹوٹے دانتوں والے سانپوں کی طرح لمبی سانسیں بھرتے ہوئے وہ الگ الگ کہنے لگے—“ہائے! ہم پر لعنت، لعنت! پارتھ چلا گیا، اور کرشن بھی چلا گیا۔”

Verse 20

त्वत्सेना: सर्वतो दृष्टवा लोमहर्षणमद्भुतम्‌ । त्वरध्वमिति चाक्रन्दन्‌ नैतदस्तीति चाब्रुवन्‌

آپ کی پوری فوج نے وہ عجیب و ہیبت ناک، رونگٹے کھڑے کر دینے والا منظر دیکھ کر ہر طرف سے پکارا—“اے بہادرو! یہ نہیں ہو سکتا؛ تم سب جلدی سے ان کا پیچھا کرو!”

Verse 21

सर्वक्षत्रस्य मिषतो रथेनैकेन दंशितौ । बाल: क्रीडनकेनेव कदर्थीकृत्य नो बलम्‌

سنجے نے کہا—تمام کشتریوں کی آنکھوں کے سامنے اُن دونوں زرہ پوش دلیران نے ایک ہی رتھ سے ہماری فوج کو ذلیل کر دیا۔ جیسے بچہ کھلونوں سے کھیلتا ہوا بے روک ٹوک نکل جاتا ہے، ویسے ہی ہماری قوت کو حقیر جان کر وہ بادشاہوں کی مجلس کے بیچ اپنا پرَاکرم دکھاتے ہوئے بلا رکاوٹ آگے بڑھ گئے۔

Verse 22

क्रोशतां यतमानानामसंसक्तौ परंतपौ | दर्शयित्वा$5त्मनो वीर्य प्रयातौ सर्वराजसु

سنجے نے کہا—ہم چیختے چلاتے اور روکنے کی کوشش کرتے رہے، مگر انہیں روک نہ سکے۔ دشمنوں کو تپانے والے زرہ پوش شری کرشن اور ارجن تمام بادشاہوں کے بیچ اپنا پرَاکرم دکھا کر، ہماری قوت کو نظرانداز کرتے ہوئے، ایک ہی رتھ سے بے روک ٹوک آگے بڑھ گئے—جیسے بچہ کھلونوں سے کھیلتا ہوا سرک جاتا ہے۔

Verse 23

(यथा दैवासुरे युद्धे तृणीकृत्य च दानवान्‌ । इन्द्राविष्णू पुरा राजन्‌ जम्भस्य वधकाडुक्षिणौ ।।

سنجے نے کہا—اے راجن! جیسے قدیم دیو-اسُر جنگ میں جَنبھ کے وध کے خواہاں اندر اور بھگوان وِشنو نے دانَووں کو تنکے کی مانند حقیر جان کر پیش قدمی کی تھی، ویسے ہی شری کرشن اور کِریٹ دھاری ارجن جَیدرتھ کے وध کے لیے عظیم رفتار سے آگے بڑھ رہے ہیں۔ اُن دونوں کو پھر آگے بڑھتے دیکھ کر دوسرے سپاہی پکار اٹھے—“اے سب کورو! کرشن اور کِریٹ دھاری ارجن کے وध کے لیے جلد از جلد ہر کوشش کرو!”

Verse 24

रथयुक्तो हि दाशाहों मिषतां सर्वधन्विनाम्‌ । जयद्रथाय यात्येष कदर्थीकृत्य नो रणे

سنجے نے کہا—تمام تیراندازوں کے دیکھتے دیکھتے رتھ پر سوار داشارھ شری کرشن اس میدانِ جنگ میں ہمیں حقیر جان کر سیدھا جَیدرتھ کی طرف بڑھ رہا ہے۔

Verse 25

तत्र केचिन्मिथो राजन्‌ समभाषन्त भूमिपा: । अदृष्टपूर्व संग्रामे तद्‌ दृष्टया महदद्भुतम्‌

سنجے نے کہا—اے راجن! وہاں کچھ فرمانرواؤں نے میدانِ جنگ میں وہ عظیم، بے مثال عجوبہ دیکھ کر آپس میں گفتگو شروع کر دی۔

Verse 26

सर्वसैन्यानि राजा च धृतराष्ट्रो5त्ययं गतः । दुर्योधनापराधेन क्षत्रं कृत्स्ना च मेदिनी

سنجے نے کہا— تمام لشکر اور بادشاہ دھرتراشٹر بھی ہلاکت و تباہی کو پہنچ گئے۔ دُریودھن کے گناہ کے سبب پورا کشتریہ طبقہ اور ساری دھرتی ویران ہو گئی۔

Verse 27

इत्येवं क्षत्रियास्तत्र ब्रुवन्त्यन्ये च भारत

اے بھارت! وہاں دوسرے کشتری بھی اسی طرح کی باتیں کہہ رہے تھے۔

Verse 28

सिन्धुराजस्य यत्‌ कृत्यं गतस्य यमसादनम्‌ | तत्‌ करोतु वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रीडनुपायवित्‌

اے بھارت! جو سندھوراج جےدرَتھ یم کے دھام کو جا پہنچا ہے، اس کے جو آخری رسومات واجب ہیں، وہ غلط نظر رکھنے والا اور تدبیر سے ناواقف دھرتراشٹر ہی ادا کرے۔

Verse 29

ततः शीघ्रतरं प्रायात्‌ पाण्डव: सैन्धवं प्रति । विवर्तमाने तिग्मांशौ हृष्टे: पीतोदकै्हयै:

پھر پانی پی کر جوش و سرور سے بھرے گھوڑوں کے ساتھ پاندوپُتر ارجن، جب سورج غروب گاہ کی چوٹی کی طرف ڈھل رہا تھا، سَیندھو کی جانب اور بھی تیزی سے بڑھ چلا۔

Verse 30

त॑ प्रयान्तं महाबाहुं सर्वशस्त्रभूतां वरम्‌ । नाशवनुवन्‌ वारयितुं योधा: क्रुद्धमिवान्तकम्‌

سنجے نے کہا— وہ مہاباہو، تمام اسلحہ برداروں میں برتر سورما جب آگے بڑھا، تو یودھا اسے روک نہ سکے؛ گویا وہ غضبناک اَنتک—یعنی موت—کو ہی تھامنے کی کوشش کر رہے ہوں۔

Verse 31

जैसे क्रोधमें भरे हुए यमराजको रोकना असम्भव है, उसी प्रकार आगे बढ़ते हुए समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु अर्जुनको आपके सैनिक रोक न सके ।।

سنجے نے کہا—پھر دشمنوں کو تپانے والے پانڈو ارجن نے تمہاری فوج کو بھگا کر، سَیندھو (جَےدرَتھ) کے لیے، اسے یوں کچل ڈالا جیسے شیر ہرنوں کے ریوڑ کو ہانک کر چیر پھاڑ دیتا ہے۔

Verse 32

गाहमानस्त्वनीकानि तूर्णमश्वानचोदयत्‌ । बलाकाभ तु दाशार्ह: पाउ्चजन्यं व्यनादयत्‌

سنجے نے کہا—جب دَاشارھ شری کرشن دشمن کے لشکری صفوں میں گھستے گئے تو انہوں نے گھوڑوں کو تیز تر ہانکا اور بگلے کی مانند سفید پانچجنّیہ شنکھ کو زور دار ناد سے بجایا۔

Verse 33

कौन्तेयेनाग्रत: सृष्टा न्यपतन्‌ पृष्ठतः शरा: । तूर्णात्‌ तूर्णतरं हाश्वा: प्रावहन्‌ वातरंहस:

سنجے نے کہا—کونتی پُتر کے آگے چھوڑے ہوئے تیر پیچھے آ گرے؛ کیونکہ ہوا کی مانند تیز گھوڑے رتھ کو تیز سے تیز تر رفتار سے لیے جا رہے تھے۔

Verse 34

वायुके समान वेगशाली अश्व इतनी तीव्रातितीव्र गतिसे रथको लिये हुए भाग रहे थे कि कुन्तीकुमार अर्जुनद्वारा आगेकी ओर फेंके हुए बाण उनके रथके पीछे गिरते थे ।।

سنجے نے کہا—ہوا کی مانند تیز گھوڑے رتھ کو ایسی نہایت تیز رفتار سے لیے جا رہے تھے کہ کونتی پُتر ارجن کے آگے پھینکے ہوئے تیر رتھ کے پیچھے آ گرتے تھے۔ پھر بہت سے غضب ناک بادشاہ اور دوسرے کشتری، جےدرَتھ کے وध کے خواہاں دھننجے کو چاروں طرف سے گھیرنے کے لیے لپکے۔

Verse 35

सैन्येषु विप्रयातेषु धिष्ठितं पुरुषर्षभम्‌ । दुर्योधनो<न्वयात्‌ पार्थ त्वरमाणो महाहवे

سنجے نے کہا—جب لشکر اچانک بے ترتیبی سے ٹوٹ پڑے تو مردوں میں افضل ارجن ایک لمحہ ٹھہر کر جم گیا۔ اسی عظیم معرکے میں بادشاہ دُریودھن عجلت کے ساتھ اس کے پیچھے لگ گیا۔

Verse 36

वातोद्धृतपताकं तं रथ जलदनि:स्वनम्‌ । घोरं कपिध्वजं दृष्टवा विषण्णा रथिनो5भवन्‌

سنجے نے کہا—ہوا سے بلند لہراتا ہوا جھنڈا، بادلوں کی گرج جیسی گہری للکار، اور علم پر کپِی دھوج (ہنومان) کا نشان—اس ہولناک رتھ کو دیکھ کر سب رتھی یودھا دل شکستہ اور افسردہ ہو گئے۔

Verse 37

दिवाकरे5थ रजसा सर्वतः संवृते भृशम्‌ । शरार्ताश्न रणे योधा: शेकु: कृष्णौ न वीक्षितुम्‌

سنجے نے کہا—پھر گرد و غبار نے چاروں طرف ایسا گھنا پردہ ڈال دیا کہ سورج دیوتا بھی چھپ گیا۔ میدانِ جنگ میں تیروں سے زخمی اور ستائے ہوئے یودھا شری کرشن اور ارجن کی طرف نگاہ اٹھا کر دیکھ تک نہ سکے۔

Verse 100

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सैन्यविस्मये शततमो<ध्याय: ।। २१०० |। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सेनाविस्मयविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ

یوں شری مہابھارت کے درون پَرو کے تحت جےدرَتھ وَدھ پَرو میں ‘سَینْیَ وِسمَیَ’ کے موضوع پر سوواں ادھیائے اختتام کو پہنچا۔

Verse 263

विलयं समनुप्राप्ता तच्च राजा न बुध्यते । “एकमात्र दुर्योधनके अपराधसे राजा धृतराष्ट्र तथा उनकी सम्पूर्ण सेनाएँ भारी विपत्तिमें फँस गयीं। सारा क्षत्रियसममाज और सम्पूर्ण पृथ्वी विनाशके द्वारपर जा पहुँची है। इस बातको राजा धृतराष्ट्र नहीं समझ रहे हैं!

سنجے نے کہا—ہلاکت قریب آ چکی ہے، مگر بادشاہ اسے نہیں سمجھتا۔ دُریودھن میں مرتکز اسی ایک خطا کے سبب دھرتراشٹر اور اس کی تمام فوجیں سخت آفت میں گرفتار ہو گئی ہیں؛ پوری کشتریہ برادری اور یہ زمین تباہی کے دہانے پر کھڑی ہے—پھر بھی دھرتراشٹر کو ادراک نہیں۔

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira must decide how to act when key allies are unaccounted for: he fears public reproach if Sātyaki is neglected, yet must preserve the royal center and respond to the implied peril around Arjuna—forcing a triage of duties.

Effective leadership combines ethical reasoning with operational clarity: allocate protection for critical leadership, maintain alliance obligations, and issue decisive orders even when information is incomplete and emotions are destabilizing.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative reportage emphasizing strategic conduct and moral pressure rather than a formal soteriological conclusion.

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