Puruṣottama-yoga
The Discipline of the Supreme Person) — Chapter 15 (Bhagavadgītā
१९-२०)। इसलिये वचको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है। 3. कामधेनु समस्त गौओंमें श्रेष्ठ दिव्य गौ है, यह देवता तथा मनुष्य सभीकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली है और इसकी उत्पत्ति भी समुद्रमन्थनसे हुई है; इसलिये भगवान्ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ४. इन्द्रियाराम मनुष्योंके द्वारा विषयसुखके लिये उपभोगमें आनेवाला काम निकृष्ट है, वह धर्मानुकूल नहीं है; परंतु शास्त्रविधिके अनुसार संतानकी उत्पत्तिके लिये इन्द्रियजयी पुरुषोंके द्वारा प्रयुक्त होनेवाला काम ही धर्मानुकूल होनेसे श्रेष्ठ है। अत: उसको भगवान्की विभूतियोंमें गिना गया है। ५. वासुकि समस्त सर्पोके राजा और भगवानके भक्त होनेके कारण सर्पोमें श्रेष्ठ माने गये हैं, इसलिये उनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. शेषनाग समस्त नागोंके राजा और हजार फणोंसे युक्त हैं तथा भगवान्की शय्या बनकर और नित्य उनकी सेवामें लगे रहकर उन्हें सुख पहुँचानेवाले, उनके परम अनन्यभक्त और बहुत बार भगवानके साथ- साथ अवतार लेकर उनकी लीलामें सम्मिलित रहनेवाले हैं तथा इनकी उत्पत्ति भी भगवानसे ही मानी गयी है। इसलिये भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. वरुण समस्त जलचरोंके और जलदेवताओंके अधिपति, लोकपाल, देवता और भगवान्के भक्त होनेके कारण सबमें श्रेष्ठ माने गये हैं। इसलिये उनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ८. कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त और बहहिषदू--ये सात दिव्य पितृगण हैं। (शिवपुराण धर्म० ६३।२) इनमें अर्यमा नामक पितर समस्त पितरोंमें प्रधान होनेसे श्रेष्ठ माने गये हैं। इसलिये उनको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है। ९, मर्त्य और देवजगत्में, जितने भी नियमन करनेवाले अधिकारी हैं, यमराज उन सबमें बढ़कर हैं। इनके सभी दण्ड न्याय और धर्मसे युक्त, हितपूर्ण और पापनाशक होते हैं। ये भगवानके ज्ञानी भक्त और लोकपाल भी हैं। इसीलिये भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। १३०. यहाँ 'काल' शब्द क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि नामोंसे कहे जानेवाले समयका वाचक है। यह गणितविद्याके जाननेवालोंकी गणनाका आधार है। इसलिये कालको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३३. दितिके वंशजोंको दैत्य कहते हैं। उन सबमें प्रह्नाद उत्तम माने गये हैं; क्योंकि वे सर्वसद्गुणसम्पन्न, परम धर्मात्मा और भगवानके परम श्रद्धालु, निष्काम, अनन्यप्रेमी भक्त हैं तथा दैत्योंके राजा हैं। इसलिये भगवानने उनको अपना स्वरूप बतलाया है। ३२. सिंह सब पशुओंका राजा माना गया है। वह सबसे बलवान, तेजस्वी, शूरवीर और साहसी होता है। इसलिये भगवानने सिंहको अपनी विभूतियोंमें गिना है। १३३. विनताके पुत्र गरुड़जी पक्षियोंक राजा और उन सबसे बड़े होनेके कारण पक्षियोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। साथ ही ये भगवान्के वाहन, उनके परम भक्त और अत्यन्त पराक्रमी हैं। इसलिये गरुड़को भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है। ३. राम” शब्द दशरथपुत्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका वाचक है। उनको अपना स्वरूप बतलाकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि भिन्न-भिन्न युगोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी लीला करनेके लिये मैं ही भिन्न-भिन्न रूप धारण करता हूँ। श्रीराममें और मुझमें कोई अन्तर नहीं है, स्वयं मैं ही श्रीरामरूपमें अवतीर्ण होता हूँ। २. जितने प्रकारकी मछलियाँ होती हैं, उन सबमें मगर बहुत बड़ा और बलवान होता है; इसी विशेषताके कारण मछलियोंमें मगरको भगवानने अपनी विभूति बतलाया है। 3. जाह्नवी अर्थात् श्रीभागीरथी गंगाजी समस्त नदियोंमें परम श्रेष्ठ हैं; ये श्रीभगवानके चरणोदकसे उत्पन्न, परम पवित्र हैं। पुराण और इतिहासोंमें इनका बड़ा भारी माहात्म्य बतलाया गया है। श्रीमद्भागवतमें कहा है-- धातु: कमण्डलुजलं तदुरुक्रमस्य पादावनेजनपवित्रतया नरेन्द्र । स्वर्धुन्यभून्नभसि सा पतती निमार्ष्टि लोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्ति: ।। (८,अमी5ः हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद् भीता: प्राज्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि: पुष्कलाभि: वे ही देवताओंके समूह आपमें प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणोंका उच्चारण करते हैं: तथा महर्षि और सिद्धोंक समुदाय “कल्याण हो” ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति करते हैं?
arjuna uvāca | atha keśava te vākyaṁ śrutvā hṛṣṭo 'smi mādhava |
ارجن نے کہا: اے کیشو، اے مادھو! تمہارے کلمات سن کر میں مسرّت سے بھر گیا ہوں۔ تمہاری تعلیم نے واضح کر دیا کہ ہر فضیلت کے پسِ پشت تمہاری ہی الوہی حضوری ہے، اور آنے والی جنگ کے اخلاقی دباؤ میں میرے دل و دماغ کو ثبات ملا ہے۔
अजुन उवाच