अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
चज्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् | तस्याहं निग्रहं मनन््ये वायोरिव सुदुष्करम्,क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाववाला,* बड़ा दृढ़* और बलवान” है। इसलिये उसका वशमें करना मैं वायुके रोकनेकी भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham | tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyor iva suduṣkaram ||
کیونکہ، اے کرشن! یہ من بے شک بے قرار، ہیجان انگیز، طاقتور اور سخت گیر ہے؛ اس لیے میں اس کے قابو کو ہوا کو روکنے کے مانند نہایت دشوار سمجھتا ہوں۔
अजुन उवाच