कālacakra-वर्णनम् तथा āśrama-धarma-निरूपणम्
The Wheel of Time and the Norms of the Āśramas
ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! मनके समान वेगवाला (देहरूपी) मनोरम कालचक्र निरन्तर चल रहा है। यह महत्तत्त्वसे लेकर स्थूल भूतोंतक चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ है। इसकी गति कहीं भी नहीं रुकती। यह संसार-बन्धनका अनिवार्य कारण है। बुढ़ापा और शोक इसे घेरे हुए हैं। यह रोग और दुर्व्यसनोंकी उत्पत्तिका स्थान है। यह देश और कालके अनुसार विचरण करता रहता है। बुद्धि इस काल-चक्रका सार, मन खम्भा और इन्द्रियसमुदाय बन्धन हैं। पठचमहाभूत इसका तना है। अज्ञान ही इसका आवरण है। श्रम तथा व्यायाम इसके शब्द हैं। रात और दिन इस चक्रका संचालन करते हैं। सर्दी और गर्मी इसका घेरा है। सुख और दुःख इसकी सन्धियाँ (जोड़) हैं। भूख और प्यास इसके कीलक तथा धूप और छाया इसकी रेखा हैं। आँखोंके खोलने और मीचनेसे इसकी व्याकुलता (चंचलता) प्रकट होती है। घोर मोहरूपी जल (शोकाश्रु)-से यह व्याप्त रहता है। यह सदा ही गतिशील और अचेतन है। मास और पक्ष आदिके द्वारा इसकी आयुकी गणना की जाती है। यह कभी भी एक-सी अवस्थामें नहीं रहता। ऊपर-नीचे और मध्यवर्ती लोकोंमें सदा चक्कर लगाता रहता है। तमोगुणके वशमें होनेपर इसकी पापपड़कमें प्रवृत्ति होती है और रजोगुणका वेग इसे भिन्न-भिन्न कर्मोमें लगाया करता है। यह महान् दर्पसे उद्दीप्त रहता है। तीनों गुणोंके अनुसार इसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। मानसिक चिन्ता ही इस चक्रकी बन्धनपट्टिका है। यह सदा शोक और मृत्युके वशीभूत रहनेवाला तथा क्रिया और कारणसे युक्त है। आसक्ति ही उसका दीर्घ विस्तार (लंबाई-चौड़ाई) है। लोभ और तृष्णा ही इस चक्रको ऊँचे-नीचे स्थानोंमें गिरानेके हेतु हैं। अद्भुत अज्ञान (माया) इसकी उत्पत्तिका कारण है। भय और मोह इसे सब ओरसे घेरे हुए हैं। यह प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला, आनन्द और प्रीतिके लिये विचरनेवाला तथा काम और क्रोधका संग्रह करनेवाला है ।। १ -९% || एतद् द्वन्द्समायुक्ते कालचक्रमचेतनम् । विसूजेत् संक्षिपेच्चापि बोधयेत् सामरं जगत्,यह रागदद्वेषादि द्वद्दोंसे युक्त जड देहरूपी कालचक्र ही देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि और संहारका कारण है। तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिका भी यही साधन है
etad dvandvasamāyuktaṁ kālacakram acetanaṁ | visṛjet saṁkṣipet cāpi bodhayet sāmaraṁ jagat ||
برہما نے کہا—راغ و دْوَیش وغیرہ جیسے تضادات کے جوڑوں سے بندھا ہوا یہ بےجان، جسم-صورت چرخِ زمان ہی دیوتاؤں سمیت تمام جہان کو پیدا کرتا ہے اور پھر پرلَے میں اسے واپس کھینچ کر فنا بھی کر دیتا ہے۔ مگر یہی چرخ، جب درست طور پر سمجھ لیا جائے، تو بیداری کا وسیلہ بن جاتا ہے—تمیز و بصیرت کو ابھارتا ہے اور حقیقت کے علم تک پہنچنے کا آلہ ٹھہرتا ہے۔
वायुदेव उवाच
Embodied existence runs under an impersonal, insentient cycle of time driven by dualities (dvandvas). The same cycle that causes creation and dissolution can, when understood with discernment, become a doorway to tattva-jñāna (knowledge of reality) and freedom from bondage.
Vāyudeva continues a philosophical instruction describing the ‘kālacakra’—the cyclical mechanism of worldly bondage. He summarizes that this duality-bound, non-conscious process governs the arising and passing away of the cosmos (including the gods) and can also serve as a catalyst for awakening when properly comprehended.