अलोभोपाख्यानम् — शुनःसख-यातुधानी-संवादः
The Allegory of Non-Greed: Śunaḥsakha and the Yātudhānī
ऑऔपनआक्ाा बछ। अर: द्विनवतितमो< ध्याय: पितर और देवताओंका श्राद्धान्नले अजीर्ण होकर ब्रद्माजीके पास जाना और अग्निके द्वारा अजीर्णका निवारण, श्राद्धसे तृप्त हुए पितरोंका आशीर्वाद भीष्म उवाच तथा निमीौ प्रवृत्ते तु सर्व एव महर्षय: । पितृयज्ञं तु कुर्वन्ति विधिदृष्टेन कर्मणा,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठटिर! इस प्रकार जब महर्षि निमि पहले-पहल श्राद्धमें प्रवृत्त हुए, उसके बाद सभी महर्षि शास्त्रविधिके अनुसार पितृयज्ञका अनुष्ठान करने लगे
bhīṣma uvāca | tathā nimau pravṛtte tu sarva eva maharṣayaḥ | pitṛyajñaṃ tu kurvanti vidhidṛṣṭena karmaṇā ||
بھیشم نے کہا—اے یدھشٹھِر! جب راجا نِمی نے اس طرح سب سے پہلے شرادھ کی رسم کو رواج دیا، تو اس کے بعد تمام مہارشی شاستر میں مقررہ طریقے کے مطابق پِتر یَجْن (آبائی نذر) ادا کرنے لگے۔
भीष्म उवाच