मातङ्ग–शक्रसंवादः
Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities
उस्रां पुष्टां मिषतीं विश्वभोज्या- मिरावतीं धारिणीं भूधराणाम् | शिष्टाश्रयाममृतां ब्रह्म॒कान्तां गड्जां श्रयेदात्मवान् सिद्धिकाम:,जो अमृतमय दूध देनेवाली, गौके समान सबको पुष्ट करनेवाली, सब कुछ देखनेवाली, सम्पूर्ण जगत्के उपयोगमें आनेवाली, अन्न देनेवाली तथा पर्वतोंको धारण करनेवाली हैं, श्रेष्ठ पुरुष जिनका आश्रय लेते हैं और जिन्हें ब्रह्माजी भी प्राप्त करना चाहते हैं; तथा जो अमृतस्वरूप हैं, उन भगवती गंगाजीका सिद्धिकामी जितात्मा पुरुषोंको अवश्य आश्रय लेना चाहिये
usrāṁ puṣṭāṁ miṣatīṁ viśvabhojyām irāvatīṁ dhāriṇīṁ bhūdharāṇām | śiṣṭāśrayām amṛtāṁ brahmakāntāṁ gaṅgāṁ śrayed ātmavān siddhikāmaḥ ||
سِدھ نے کہا—جو امرت مَے دودھ دینے والی، گائے کی مانند سب کو پرورش دینے والی، سب کچھ دیکھنے والی، سارے جگت کے لیے مفید، رزق و اَنّ دینے والی اور پہاڑوں کو تھامنے والی ہے؛ جس کی پناہ شائستہ لوگ لیتے ہیں، جسے برہما بھی پانے کی آرزو کرتا ہے، اور جو امرت-سْوَرُوپا ہے—سِدھی چاہنے والا ضبطِ نفس رکھنے والا مرد لازماً اسی بھگوتی گنگا کی پناہ لے۔
सिद्ध उवाच