मातङ्ग–शक्रसंवादः
Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities
शिलवृत्तेगहं प्राप्त: स तेन विधिनार्चित: । उवास रजनी तत्र सुमुख: सुखभागृषि:,मनुष्योंमें श्रेष्ठ कोई सिद्ध पुरुष शैलमालाओंसे अलंकृत इस समूची पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा करनेके पश्चात् शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक श्रेष्ठ गृहस्थके घर गया। उस गृहस्थने उसकी विधिपूर्वक पूजा की। वह समागत ऋषि वहाँ बड़े सुखसे रातभर रहा। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी
śilavṛtte gṛhaṁ prāptaḥ sa tena vidhinārcitaḥ | uvāsa rajanīṁ tatra sumukhaḥ sukhabhāg ṛṣiḥ ||
شِلو وِرتّی والے گِرہستھ کے گھر پہنچ کر وہ سِدھ رِشی اس کے ہاتھوں رسم کے مطابق پوجا گیا۔ پھر وہ رِشی وہاں آرام و سکون سے پوری رات ٹھہرا؛ اس کا چہرہ مطمئن اور شاداں تھا۔
भीष्म उवाच