Aṣṭāvakra’s Visit to Kubera: Hospitality, Temptation, and the Ethics of Restraint (अष्टावक्र-वैश्रवणोपाख्यानम्)
ब्रह्मा शक्रो मारुतो ब्रह्म सत्यं वेदा यज्ञा दक्षिणा वेदवाहा: । सोमो यष्टा यच्च हव्यं हविश्व रक्षा दीक्षा संयमा ये च केचित्,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो
brahmā śakro māruto brahma satyaṁ vedā yajñā dakṣiṇā vedavāhāḥ | somo yaṣṭā yac ca havyaṁ haviś ca rakṣā dīkṣā saṁyamā ye ca kecit ||
وایودیو نے کہا— “برہما، اندر اور میں (ماروت/وایو)؛ برہمن اور سچ؛ وید، یَجْن اور دَکشِنا؛ وید کے حاملین؛ سوم؛ یجمان؛ جو ہویہ ہے اور جو ہَوِس ہے؛ حفاظت، دِیکشا اور ہر طرح کا ضبطِ نفس—یہ سب مہادیو کے سہارے قائم ہیں، یہ جان لو۔”
वायुदेव उवाच
Ritual power (Veda, yajña, oblations) and ethical power (satya, saṁyama, dīkṣā) are presented as parts of one sacred, divinely grounded order; true dharma integrates truthfulness, disciplined restraint, and rightful worship rather than treating them as separate domains.
Vāyu speaks in a didactic setting, listing major deities and key ritual-ethical elements to assert their sanctity and interdependence, reinforcing that the foundations of religious practice and moral discipline are upheld by higher divine principles.