यद्यन्मुण्चति गात्र हि स शान्तनुसुतस्तदा । तत् तद् विशल्यं भवति योगयुक्तस्य तस्य वै,प्रभो! उस समय वहाँ एकत्र हुए सभी संत-महात्माओंके बीच एक बड़े आश्वर्यकी घटना घटी। व्यास आदि सब महर्षियोंने देखा कि योगयुक्त हुए शान्तनुनन्दन भीष्मके प्राण उनके जिस-जिस अंगको त्यागकर ऊपर उठते थे, उस-उस अंगके बाण अपने-आप निकल जाते और उनका घाव भर जाता था
yadyan muñcati gātra hi sa śāntanusutas tadā | tat tad viśalyaṁ bhavati yogayuktasya tasya vai ||
یوگ میں مستغرق شانتنو کے فرزند بھیشم جس جس عضو سے پران کو ہٹاتے، وہ وہ عضو فوراً تیروں سے پاک ہو جاتا؛ تیر خود بخود نکل جاتے اور زخم بھر جاتے۔
वैशम्पायन उवाच