Vasiṣṭhasya śokaḥ, Vipāśā–Śatadrū-nāmākaraṇam, Kalmāṣapādasya bhaya-prasaṅgaḥ (Ādi Parva 167)
द्रोणाद् विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मुवित्तमम् । द्रोणान्तकमहं पुत्र लभेयं युधि दुर्जयम्,“आप वेदवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण द्रोणाचार्यसे बहुत बढ़े-चढ़े हैं। मैं आपकी शरण लेकर एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो युद्धमें दुर्जय और द्रोणाचार्यका विनाशक हो
آپ وید کے جاننے والوں میں سب سے برتر ہیں، اس لیے درون آچاریہ سے بھی بڑھ کر ہیں۔ میں آپ کی پناہ لے کر ایسا بیٹا چاہتا ہوں جو جنگ میں ناقابلِ شکست ہو اور درون کا ہلاک کرنے والا بنے۔
ब्राह्मण उवाच