मेघगम्भीरनादेन तर्जयन्तं महास्वनम् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तत्पश्चात् उस समय इस प्रकार बोलनेवाले उस यक्षकी वह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने देखा, एक विकट नेत्रोंवाला विशालकाय यक्ष वृक्षके ऊपर बैठा है। वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताड़के समान लंबा, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी तथा पर्वतके समान ऊँचा है। वही अपनी मेघके समान गम्भीर नादयुक्त वाणीसे उन्हें फटकार रहा है। उसकी आवाज बहुत ऊँची है ।। यक्ष उवाच इमे ते भ्रातरो राजन् वार्यमाणा मयासकृत्,यक्षने कहा--राजन्! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ
meghagambhīranādena tarjayantaṃ mahāsvanam | yakṣa uvāca: ime te bhrātaro rājan vāryamāṇā mayā sakṛt |
Sa tinig na malalim na parang kulog sa ulap, umungal ang Yaksha at nagbanta sa makapangyarihang himig. Sinabi niya: “O Hari, ang mga kapatid mo’y paulit-ulit kong pinigilan, ngunit pilit nilang kukunin ang tubig sa dahas; kaya sila’y aking pinabagsak. O Yudhiṣṭhira, kung ibig mong iligtas ang buhay, huwag kang uminom sa tubig na ito. O Pārtha, huwag kang mangahas uminom—ang tubig na ito’y nasa aking kapangyarihan. Anak ni Kuntī, sagutin mo muna ang aking mga tanong; saka ka lamang iinom at makapagdala ng tubig.”
यक्ष उवाच
Need does not justify transgression: one must practice restraint, respect rightful authority, and seek truth through right inquiry (answering questions) before acting—dharma precedes desire and survival-instinct.
After the other brothers fall for drinking the forbidden water, Yudhiṣṭhira arrives and confronts the Yaksha, who claims the water, explains why the brothers were struck down, and sets a condition: answer his questions first, then drink and take water.