Udyoga Parva, Adhyaya 31 — Yudhiṣṭhira’s Instructions to Sañjaya
Peace Appeal and Five-Village Proposal
ऑपन--+र< बक। है २ द्वात्रिशोड्ध्याय: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना वैशम्पायन उवाच (धर्मराजस्य तु वच: श्रुत्वा पार्थो धनंजय: । उवाच संजयं तत्र वासुदेवस्य शृण्वतः ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरकी बात सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए वहाँ संजयसे इस प्रकार कहा। अर्जुन उवाच पितामहं शान्तनवं धृतराष्ट्रं च संजय । द्रोणं सपुत्रं शल्यं च महाराजं च बाह्विकम् ।। विकर्ण सोमदत्तं च शकुनिं चापि सौबलम् | विविंशतिं चित्रसेनं जयत्सेनं च संजय ।। भगदत्तं तथा चैव शूरं रणकृतां वरम् ।। ये चाप्यन्ये कुरवस्तत्र सन्ति राजानश्रैद् भूमिपाला: समेता: । युयुत्सव: पार्थिवा: सैन्धवाश्न समानीता धार्तराष्ट्रेण सूत ।। यथान्यायं कुशलं वन्दनं च समागमे मद्धवचनेन वाच्या: । ततो ब्रूया: संजय राजमध्ये दुर्योधनं पापकृतां प्रधानम् ।। अर्जुन बोले--संजय! शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, धृतराष्ट्र, पुत्रसहित द्रोणाचार्य, महाराज शल्य, बाह्नीक, विकर्ण, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, विविंशति, चित्रसेन, जयत्सेन तथा योद्धाओंमें श्रेष्ठ शूरवीर भगदत्त--इन सबसे और दूसरे भी जो कौरव वहाँ रहते हैं, युद्धकी इच्छासे जो-जो राजा वहाँ एकत्र हुए हैं तथा दुर्योधनने जिन-जिन भूमिपालों और सिंधुदेशीय वीरोंको बुला रखा है, उन सबसे भी यथोचित रीतिसे मिलकर मेरी ओरसे कुशल और अभिवादन कहना। तत्पश्चात् राजाओंकी मण्डलीमें पापियोंके सिरमौर दुर्योधनको मेरा संदेश सुना देना। वैशम्पायन उवाच एवं प्रतिष्ठाप्प धनंजयस्तं ततोडर्थवद् धर्मवच्चैव पार्थ: । उवाच वाक्यं स्वजनप्रहर्ष वित्रासनं धृतराष्ट्रात्मजानाम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इस प्रकार कुन्तीपुत्र धनंजयने संजयको जानेकी अनुमति देकर अर्थ और धर्मसे युक्त बात कही, जो स्वजनोंको हर्ष देनेवाली तथा धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी भयभीत करनेवाली थी। अर्जुनेन समादिष्टस्तथेत्युक्त्वा तु संजय: । पार्थानामन्त्रयामास केशवं च यशस्विनम् ।। ) अर्जुनके इस प्रकार आदेश देनेपर संजयने “तथास्तु” कहकर उसे शिरोधार्य किया। तत्पश्चात् उसने अन्य कुन्तीकुमारों तथा यशस्वी भगवान् श्रीकृष्णसे जानेकी अनुमति माँगी। अनुज्ञात: पाण्डवेन प्रययौं संजयस्तदा । शासन धृतराष्ट्रस्य सर्व कृत्वा महात्मन:,पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर संजय महामना राजा धुृतराष्ट्रके सम्पूर्ण आदेशोंका पालन करके उस समय वहाँसे प्रस्थित हुए
vaiśampāyana uvāca | dharmarājasya tu vacaḥ śrutvā pārtho dhanañjayaḥ | uvāca sañjayaṃ tatra vāsudevasya śṛṇvataḥ ||
Sinabi ni Vaiśampāyana: Nang marinig ang mga salita ni Dharmarāja Yudhiṣṭhira, si Pārtha Dhanañjaya (Arjuna) ay nagsalita kay Sañjaya roon, habang nakikinig si Vāsudeva (Kṛṣṇa). Ipinapakita ng tagpong ito na ang mensahe ni Arjuna ay nakaugat sa dharma at pananagutan: hayagang ibinigay ang payo sa harap ni Kṛṣṇa bago ito dalhin sa hukuman ng mga Kaurava.
वैशम्पायन उवाच
Speech and action should be rooted in dharma and delivered with accountability: Arjuna speaks after hearing Yudhiṣṭhira’s righteous counsel, and he speaks in Kṛṣṇa’s presence—signaling that political messaging must be ethically grounded and open to moral scrutiny.
After listening to Yudhiṣṭhira, Arjuna begins addressing Sañjaya, who will serve as a messenger to the Kaurava side. Kṛṣṇa is present and listening, framing the forthcoming message as part of the pre-war diplomatic exchange in Udyoga Parva.