दुर्ग-निवेश-राजधर्मः | Fortified Capital and the King’s Residential Polity
Rājadharma
अत-४-णर+ ३. सेवा करनेको सदा तैयार रहना, कही हुई बातको ध्यानसे सुनना, उसे ठीक-ठीक समझना, याद रखना, किस कार्यका कैसा परिणाम होगा-इसपर तर्क करना, यदि अमुक प्रकारसे कार्य सिद्ध न हुआ तो क्या करना चाहिये?--इस तरह वितर्क करना, शिल्प और व्यवहारकी जानकारी रखना और तत्त्वका बोध होना--ये आठ गुण पौराणिक सूतमें होने चाहिये। २, शिकार, जूआ, परस्त्रीप्रसंग और मदिरापान--ये चार कामजनित दोष और मारना, गाली बकना तथा दूसरेकी चीज खराब कर देना--ये तीन क्रोधजनित दोष मिलकर सात दुर्व्यसन माने गये हैं। षडशीतितमो< ध्याय: राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश युधिष्ठिर उदाच कथंविध॑ पुरं राजा स्वयमावस्तुमर्हति । कृतं वा कारयित्वा वा तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! राजाको स्वयं कैसे नगरमें निवास करना चाहिये? वह पहलेसे बनी हुई राजधानीमें रहे या नये नगरका निर्माण कराकर उसमें निवास करे, यह मुझे बताइये?
yudhiṣṭhira uvāca | kathaṃvidhaṃ puraṃ rājā svayam āvastum arhati | kṛtaṃ vā kārayitvā vā tan me brūhi pitāmaha ||
Sinabi ni Yudhiṣṭhira: “Lolo, anong uri ng lungsod ang nararapat tirhan mismo ng isang hari? Dapat ba siyang manirahan sa naitatag nang kabisera, o magpagawa muna ng bagong lungsod at doon tumira? Ipagpaumanhin at ipaliwanag ninyo sa akin.”
भीष्म उवाच