वृत्ति-सत्सङ्ग-दान-धर्म
Livelihood, Virtuous Association, and Ethics of Giving
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६६ श्लोक हैं) खपत जन लि हि - अध्याय २८० के ५९ वें श्लोकमें आया है कि 'वृत्रासुरने अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर उन्हींका चिन्तन करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वरके परम धामको प्राप्त कर लिया'--यहाँ भी इतनी बात और समझ लेनी चाहिये। त्रयशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: शिवजीद्दारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप युधिषछ्िर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । अस्मिन् वृत्रवधे देव विवक्षा मम जायते,युधिष्ठिरने पूछा--सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! देव! इस वृत्रवधके प्रसंगमें मुझे कुछ पूछनेकी इच्छा हो रही है
yudhiṣṭhira uvāca | pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | asmin vṛtravadhē deva vivakṣā mama jāyatē ||
Sinabi ni Yudhiṣṭhira: “Lolo, ikaw ay lubhang marunong at ganap na bihasa sa lahat ng mga kasulatan. O kagalang-galang, hinggil sa pangyayaring pagpaslang kay Vṛtra, may tanong na sumibol sa aking isipan, at nais ko itong itanong.”
युधिषछ्िर उवाच