Adhyāya 6: Śibira-dvāra-sthita Bhūta-varṇana and Aśvatthāmā’s Śaraṇāgati to Mahādeva
तत्र भूतं महाकायं चन्द्रार्कसदृशद्युतिम् सो<पश्यद् द्वारमाश्रित्य तिष्ठन्तं लोमहर्षणम्,वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्धुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याप्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था
tatra bhūtaṁ mahākāyaṁ candrārka-sadṛśa-dyutim so ’paśyad dvāram āśritya tiṣṭhantaṁ lomaharṣaṇam
Doon ay nakita niya ang isang di-pangkaraniwang nilalang, dambuhala ang katawan at nagniningning na tila buwan at araw, na nakatindig sa may pintuan na wari’y humaharang sa daraanan—nakapanghihilakbot na sa tingin pa lamang ay tumitindig ang balahibo.
संजय उवाच