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Shloka 7

Guṇa-traya-vibhāga-yoga (त्रिगुणविभागयोग) — The Analysis of the Three Guṇas

#फमा न () असडजतन- ६. 'प्रीयमाणाय” विशेषणका प्रयोग करके भगवानने यह दिखलाया है कि हे अर्जुन! तुम्हारा मुझमें अतिशय प्रेम है, मेरे वचनोंको तुम अमृततुल्य समझकर अत्यन्त श्रद्धा और प्रेमके साथ सुनते हो; इसीलिये मैं किसी प्रकारका संकोच न करके बिना पूछे भी तुम्हारे सामने अपने परम गोपनीय गुण, प्रभाव और तत्त्वका रहस्य बार-बार खोल रहा हूँ। इसमें तुम्हारा प्रेम ही कारण है। ३. इस अध्यायमें भगवानने अपने गुण, प्रभाव और तत्त्वका रहस्य समझानेके लिये जो उपदेश दिया है, वही “परम वचन' है और उसे फिरसे सुननेके लिये कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मेरी भक्तिका तत्त्व अत्यन्त ही गहन है; अतः उसे बार-बार सुनना परम आवश्यक समझकर बड़ी सावधानीके साथ श्रद्धा और प्रेमपूर्वक सुनना चाहिये। २. 'सुरगणा:” पद एकादश रुद्र, आठ वसु, बारह आदित्य, प्रजापति, उनचास मरुद्गण, अश्विनीकुमार और इन्द्र आदि जितने भी शास्त्रीय देवताओंके समुदाय हैं--उन सबका वाचक है। ३. 'महर्षय:” पदसे यहाँ सप्त महर्षियोंको समझना चाहिये। ४. भगवान्‌का अपने अतुलनीय प्रभावसे जगत्‌का सृजन, पालन और संहार करनेके लिये ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रके रूपमें; दुष्टोके विनाश, धर्मके संस्थापन तथा नाना प्रकारकी लीलाओंके द्वारा जगत्‌के प्राणियोंके उद्धारके लिये श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि दिव्य अवतारोंके रूपमें; भक्तोंको दर्शन देकर उन्हें कृतार्थ करनेके लिये उनके इच्छानुरूप नाना रूपोंमें तथा लीलावैचित्रयकी अनन्त धारा प्रवाहित करनेके लिये समस्त विश्वके रूपमें जो प्रकट होना है--उसीका वाचक यहाँ “प्रभव” शब्द है। उसे देवसमुदाय और महर्षिलोग नहीं जानते, इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मैं किस-किस समय किन-किन रूपोंमें किन-किन हेतुओंसे किस प्रकार प्रकट होता हूँ--इसके रहस्यको साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, अतीन्द्रिय विषयोंको समझनेमें समर्थ देवता और महर्षिलोग भी यथार्थरूपसे नहीं जानते। ५. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जिन देवता और महर्षियोंसे इस सारे जगत्‌की उत्पत्ति हुई है, वे सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं; उनका निमित्त और उपादान कारण मैं ही हूँ और उनमें जो विद्या, बुद्धि, शक्ति, तेज आदि प्रभाव हैं--वे सब भी उन्हें मुझसे ही मिलते हैं। ६. भगवान्‌ अपनी योगमायासे नाना रूपोंमें प्रकट होते हुए भी अजन्मा हैं (गीता ४।६), अन्य जीवोंकी भाँति उनका जन्म नहीं होता, वे अपने भक्तोंको सुख देने और धर्मकी स्थापना करनेके लिये केवल जन्मधारणकी लीला किया करते हैं--इस बातको श्रद्धा और विश्वासके साथ ठीक-ठीक समझ लेना तथा इसमें जरा भी संदेह न करना--यही “भगवान्‌को अजन्मा जानना” है तथा भगवान्‌ ही सबके आदि अर्थात्‌ महाकारण हैं, उनका आदि कोई नहीं है; वे नित्य हैं तथा सदासे हैं, अन्य पदार्थोकी भाँति उनका किसी कालविशेषसे आरम्भ नहीं हुआ है--इस बातको श्रद्धा और विश्वासके साथ ठीक-ठीक समझ लेना --“भगवान्‌को अनादि जानना' है। एवं जितने भी ईश्वरकोटिमें गिने जानेवाले इन्द्र, वरुण, यम, प्रजापति आदि लोकपाल हैं--भगवान्‌ उन सबके महान ईश्वर हैं; वे ही सबके नियन्ता, प्रेरक, कर्ता, हर्ता, सब प्रकारसे सबका भरण-पोषण और संरक्षण करनेवाले सर्वशक्तिमान्‌ परमेश्वर हैं--इस बातको श्रद्धापूर्वक संशयरहित ठीक-ठीक समझ लेना, “भगवान्‌को लोकोंका महान्‌ ईश्वर जानना” है। ७. कर्तव्य-अकर्तव्य, ग्राह्म-अग्राह्म और भले-बुरे आदिका निर्णय करके निश्चय करनेवाली जो वृत्ति है, उसे “बुद्धि कहते हैं। ८. किसी भी पदार्थको यथार्थ जान लेना 'ज्ञान' है; यहाँ 'ज्ञान' शब्द साधारण ज्ञानसे लेकर भगवानके स्वरूपज्ञानतक सभी प्रकारके ज्ञानका वाचक है। ९. भोगासक्त मनुष्योंको नित्य और सुखप्रद प्रतीत होनेवाले समस्त सांसारिक भोगोंको अनित्य, क्षणिक और दु:ःखमूलक समझकर उनमें मोहित न होना--यही “असम्मोह' है। १. किसी भी प्राणीको किसी भी समय किसी भी प्रकारसे मन, वाणी या शरीरके द्वारा जरा भी कष्ट न पहुँचानेके भावको अहिंसा" कहते हैं। २. सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, निन्दा-स्तुति, मान-अपमान, मित्र-शत्रु आदि जितने भी क्रिया, पदार्थ और घटना आदि विषमताके हेतु माने जाते हैं, उन सबमें निरन्तर राग-द्वेषरहित समबुद्धि रहनेके भावको “समता” कहते हैं। 3. जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसे प्रारब्धका भोग या भगवानका विधान समझकर सदा संतुष्ट रहनेके भावको "तुष्टि" कहते हैं। ४. बुरा चाहना, बुरा करना, धनादि हर लेना, अपमान करना, आघात पहुँचाना, कड़ी जबान कहना या गाली देना, निन्‍दा या चुगली करना, आग लगाना, विष देना, मार डालना और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षमें क्षति पहुँचाना आदि जितने भी अपराध हैं, इनमेंसे एक या अधिक किसी प्रकारका भी अपराध करनेवाला कोई भी प्राणी क्यों न हो, अपनेमें बदला लेनेका पूरा सामर्थ्य रहनेपर भी उससे उस अपराधका किसी प्रकार भी बदला लेनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर देना और उस अपराधके कारण उसे इस लोक या परलोकमें कोई भी दण्ड न मिले--ऐसा भाव होना “क्षमा' है। ५. इन्द्रिय और अन्त:करणद्वारा जो बात जिस रूपमें देखी, सुनी और अनुभव की गयी हो, ठीक उसी रूपमें दूसरेको समझानेके उद्देश्यसे हितकर प्रिय शब्दोंमें उसको प्रकट करना “सत्य' है। ६. 'सुख' शब्द यहाँ प्रिय (अनुकूल) वस्तुके संयोगसे और अप्रिय (प्रतिकूल)-के वियोगसे होनेवाले सब प्रकारके सुखोंका वाचक है। इसी प्रकार प्रियके वियोगसे और अप्रियके संयोगसे होनेवाले आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक--सब प्रकारके दु:खोंका वाचक यहाँ “दुःख” शब्द है। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि प्राणियोंके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले कष्टोंकी 'आधिभौतिक', अनावृष्टि, अतिवृष्टि, भूकम्प, वजपात और अकाल आदि दैवीप्रकोपसे होनेवाले कष्टोंको “आधिदैविक' और शरीर, इन्द्रिय तथा अन्त:करणमें किसी प्रकारके रोगसे होनेवाले कष्टोंको “आध्यात्मिक' दुःख कहते हैं। ७. सर्गकालमें समस्त चराचर जगतका उत्पन्न होना “भव” है, प्रलयकालमें उसका लीन हो जाना “अभाव' है। किसी प्रकारकी हानि या मृत्युके कारणको देखकर अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाले भावका नाम “भय” है और सर्वत्र एक परमेश्वरको व्याप्त समझ लेनेसे अथवा अन्य किसी कारणसे भयका जो सर्वथा अभाव हो जाना है वह “अभय है। ८. स्वधर्म-पालनके लिये कष्ट सहन करना “तप है। ९. अपने स्वत्वको दूसरोंके हितके लिये वितरण करना “दान' है। १०. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि विभिन्न प्राणियोंके उनकी प्रकृतिके अनुसार उपर्युक्त प्रकारके जितने भी विभिन्न भाव होते हैं, वे सब मुझसे ही होते हैं, अर्थात्‌ वे सब मेरी ही सहायता, शक्ति और सत्तासे होते हैं। ३३. “चत्वार: पूर्वँ से सबसे पहले होनेवाले सनक, सननन्‍्दन, सनातन और सनत्कुमार--इन चारोंको लेना चाहिये। ये भी भगवानके ही स्वरूप हैं और ब्रह्माजीके तप करनेपर स्वेच्छासे प्रकट हुए हैं। ब्रह्माजीने स्वयं कहा है-- तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे आदौ सनात्‌ स्वतपस: स चतुःसनो<भूत्‌ । प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्त्वं सम्यग्‌ जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन्‌ ।। (श्रीमद्भागवत २

arjuna uvāca

Sinabi ni Arjuna: (Ito ay panandang nagsasaad kung sino ang nagsasalita, na nagpapakilala sa tugon ni Arjuna sa diyalogo.) Sa etikal at salaysay na tagpo ng Bhīṣma Parva—sa mismong bingit ng digmaan—ang mga salita ni Arjuna ay hudyat ng paglipat mula sa pakikinig tungo sa pagtatanong at pagninilay-moral, habang hinaharap niya ang turo ni Kṛṣṇa upang lutasin ang pag-aalinlangan tungkol sa tungkulin, wastong pagkilos, at landas tungo sa panloob na katatagan sa gitna ng tunggalian.

[{'term''arjunaḥ', 'definition': 'Arjuna
[{'term':
the Pāṇḍava prince, chief interlocutor in the Gītā dialogue'}, {'term''uvāca', 'definition': 'said
the Pāṇḍava prince, chief interlocutor in the Gītā dialogue'}, {'term':

अजुन उवाच

A
Arjuna

Educational Q&A

This line itself does not state a doctrine; it functions as a formal cue that Arjuna is about to speak. Its value is structural: it marks the transition to Arjuna’s inquiry or response, which frames the ethical problem (dharma in crisis) and invites clarification from Kṛṣṇa.

Within Bhīṣma Parva’s battlefield dialogue, the narration signals that Arjuna now takes the role of speaker. After hearing instruction, he responds—typically by asking, doubting, or seeking a more precise understanding—so the teaching can proceed through question and answer.