Guṇa-traya-vibhāga-yoga (त्रिगुणविभागयोग) — The Analysis of the Three Guṇas
४६) “सभी देवता, समस्त मनु, सप्तर्षि तथा जो मनुके पुत्र हैं और जो ये देवताओंके अधिपति इन्द्र हैं--ये सभी भगवान् विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं।' ५. “गुडाका' निद्राको कहते हैं। उसके स्वामीको “गुडाकेश” कहते हैं। भगवान् अर्जुनको “गुडाकेश' नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाते हैं कि तुम निद्रापर विजय प्राप्त कर चुके हो; अतएव मेरे उपदेशको धारण करके अज्ञाननिद्राको भी जीत सकते हो। ३. समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित जो “चेतन” है, जिसको परा “प्रकृति” और “क्षेत्रज्ञ' भी कहते हैं (गीता ७।५; १३।१), उसीको यहाँ “सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा" बतलाया है। वह भगवान्का ही अंश होनेके कारण (गीता १५।७) वस्तुतः भगवत्स्वरूप ही है (गीता १३।२)। इसीलिये भगवानने कहा है कि “वह आत्मा मैं हूँ।' २. यहाँ “भूत” शब्दसे चराचर समस्त देहधारी प्राणी समझने चाहिये। ये सब प्राणी भगवानसे ही उत्पन्न होते हैं, उन्हींमें स्थित हैं और प्रलयकालमें भी उन्हींमें लीन होते हैं; भगवान् ही सबके मूल कारण और आधार हैं--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको उन सबका आदि, मध्य और अन्त बतलाया | 3. अदितिके धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वानू पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु नामक बारह पुत्रोंको द्वादश आदित्य कहते हैं-- धाता मित्रोडर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ।। एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते | जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिक: ।। (महा०, आदि० ६५।१५-१६) इनमें जो विष्णु हैं, वे इन सबके राजा हैं और अन्य सबसे श्रेष्ठ हैं। इसीलिये भगवानने विष्णुकी अपना स्वरूप बतलाया है। ४. सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि आदि जितने भी प्रकाशमान पदार्थ हैं, उन सबमें सूर्य प्रधान हैं; इसलिये भगवानने समस्त ज्योतियोंमें सूर्यकोी अपना स्वरूप बतलाया है। ५. उनचास मसरुतोंके नाम ये हैं--“सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यग्ज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित्, सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्, अन्यादृक्, यादृक्, प्रतिकृतू, ऋक्, समिति, संरम्भ, ईदृक्ष, पुरुष, अन्यादृक्ष, चेतस, समिता, समिदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मरुति, सरत, देव, दिश, यजु:, अनुदृक्, साम, मानुष और विश् (वायुपुराण ६७।१२३ से १३०)। गरुडपुराण तथा अन्यान्य पुराणोंमें कुछ नामभेद पाये जाते हैं; परंतु मरीचि” नाम कहीं भी नहीं मिला है। इसीलिये “मरीचि” को मरुत् न मानकर समस्त मरुद्गणोंका तेज या किरणें माना गया है।' दक्षकन्या मरुत्वतीसे उत्पन्न पुत्रोंकी भी मरुदगण कहते हैं (हरिवंश)। भिन्न-भिन्न मन्वन्तरोंमें भिन्न- भिन्न नामोंसे तथा विभिन्न प्रकारसे इनकी उत्पत्तिके वर्णन पुराणोंमें मिलते हैं। दितिपुत्र उनचास मरुद्गण दिति देवीके भगवद्ध्यानरूप व्रतके तेजसे उत्पन्न हैं। उस तेजके ही कारण इनका गर्भमें विनाश नहीं हो सका था। इसलिये उनके इस तेजको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. अश्विनी, भरणी और कृतिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, उन सबके स्वामी और सम्पूर्ण तारा- मण्डलके राजा होनेसे चन्द्रमा भगवान्की प्रधान विभूति हैं। इसलिये यहाँ उनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ७. ऋक्, यजु, साम और अथर्व--इन चारों वेदोंमें सामवेद अत्यन्त मधुर संगीतमय तथा परमेश्वरकी अत्यन्त रमणीय स्तुतियोंसे युक्त है; अतः वेदोंमें उसकी प्रधानता है। इसलिये भगवानने उसको अपना स्वरूप बतलाया है। ८. समस्त प्राणियोंकी जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा उनको दुःख-सुखका और समस्त पदार्थोंका अनुभव होता है, जो अन्त:करणकी वृत्तिविशेष है, गीताके तेरहवें अध्यायके छठे श्लोकमें जिसकी गणना क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है, उस ज्ञान-शक्तिका नाम “चेतना” है। यह प्राणियोंके समस्त अनुभवोंकी हेतुभूता प्रधान शक्ति है, इसलिये इसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३. हर, बहुरूप, >यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली--ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं-- हरश्न बहुरूपश्च त्रयम्बकश्नापराजित: । वृषाकपिश्च शम्भुश्न कपर्दी रैवतस्तथा ।। मृगव्याधश्न शर्वश्ष कपाली च विशाम्पते । एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवने श्वरा: ।। (हरिवंश० १
arjuna uvāca
Sinabi ni Arjuna: (Sinisimulan niya ang tugon sa paghahayag ni Kṛṣṇa tungkol sa mga banal na pagpapakita—mga vibhūti—na humihingi ng linaw at pagtitiyak hinggil sa paglaganap ng Panginoon sa lahat ng dako at kung paanong ang Iisang Katotohanan ay lumilitaw bilang maraming kapangyarihan sa daigdig. Sa etikal at salaysay na tagpo ng digmaan, ang pananalita ni Arjuna ay tanda ng pagliko mula sa pagkalito tungo sa mapitagang pagtatanong—nais maunawaan kung paano makikilala ang Banal sa gitna ng tungkulin, alitan, at sari-saring nilalang.)
अजुन उवाच