मरुत्तोपाख्यान-प्रस्तावः — Genealogy to Marutta and the Logistics of Royal Sacrifice
2: सं > यह कथन युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये गौणरूपमें इस दृष्टिसे है कि मरनेवालोंकी मृत्यु उनके प्रारब्ध-कर्मानुसार अवश्यम्भावी थी; अत: यह जो कुछ हुआ है, ईश्वर प्रेरणाके ही अनुसार हुआ है। चतुथों5 ध्याय: मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन युधिछ्िर उवाच शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षे: परिकीर्तनम् । द्ैपायन मरुत्तस्य कथां प्रब्रूहि मेडनघ,युधिष्ठिरने पूछा--धर्मके ज्ञाता, निष्पाप महर्षि द्वैपायन! मैं राजर्षि मरुत्तकी कथा और उनके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे कहिये
yudhiṣṭhira uvāca | śuśrūṣe tasya dharmajña rājarṣeḥ parikīrtanam | daipāyana maruttasya kathāṃ prabrūhi me 'nagha ||
Sinabi ni Yudhiṣṭhira: “O nakaaalam ng dharma, nais kong marinig ang tanyag na salaysay tungkol sa haring-muni na iyon. O Daipāyana, ikaw na walang kasalanan, isalaysay mo sa akin ang kuwento ni Marutta.”
युधिछ्िर उवाच