यह सोपान ‘एकाग्र-भक्ति’ का द्वार है: साधक-चित्त (हनुमान) को ‘राम-काज’ में स्थिर कर, अविद्या/विघ्न (सुरसा, सिंहिका, लंकिनी) लाँघकर ‘सीता-दर्शन’ (आत्म-शुद्धि व परम-लक्ष्य की स्मृति) तक पहुँचाना। सुंदरता यहाँ बाह्य नहीं, ‘भक्ति की शुचिता, बुद्धि की चपलता, और नाम-स्मरण की अखंडता’ है।
यह प्रकरण ‘एकाग्र-भक्ति’ का सोपान है: (1) श्लोक-स्तुति से साधक का चित्त ‘परम-शान्त’ में टिकता है—भक्ति का आधार तत्त्व-चिन्तन नहीं, तत्त्व-आश्रय है। (2) जामवंत का उपदेश ‘श्रद्धा’ का संचार है—गुरु-वाणी से सुप्त सामर्थ्य जागता है। (3) समुद्र-लाँघना ‘अहं-सीमा’ का अतिक्रमण: राम-नाम से कर्मयोग का उछाल। (4) सुरसा/सिंहिका/लंकिनी—तीन स्तर की बाधाएँ: परीक्षा (धैर्य-विनय), आकर्षण/खींच (मोह-छाया), और सीमा-द्वार (अधिकार/प्रवेश-योग्यता)। विजय का साधन केवल बल नहीं, ‘विवेक + विनय + लक्ष्य-स्मृति’ है। (5) लंका-वैभव ‘माया’ का दर्पण है—अद्भुतता वैराग्य को पुष्ट करती है: साधक भोग देखता है, पर बँधता नहीं। (6) विभीषण-गृह में राम-नाम ‘सत्संग का दीप’ है—अधर्म-परिवेश में भी नाम-आश्रय सुरक्षित आश्रय बनता है। (7) अशोक-वाटिका में सीता-दर्शन ‘आत्म-शुद्धि व परम-लक्ष्य की स्मृति’ है: करुणा के द्वारा अहं गलता है और भक्ति परिपक्व होती है।
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