Virāṭa’s Mobilization to Recover the Cattle (गोधनरक्षणार्थ विराटस्य सैन्यसमायोजनम्)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।) #:732:.8 #:23:.7 () हि 2 7 > जब शत्रुकी शक्ति अपने बराबर हो, तब उसके प्रति साम और भेदनीतिका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् उससे समझौता करना या उसकी सेनामें फूट डालनी चाहिये। यदि शत्रु अपनेसे अधिक शक्तिशाली हो, तो वहाँ दाननीतिका प्रयोग उचित है अर्थात् उसे धन, रत्न आदि भेंट देकर शान्त करना चाहिये। यदि अपनी ही शक्ति अधिक हो, तो उसे दण्ड देना या युद्धमें मार गिराना चाहिये। अत: अपने और विपक्षीके बलाबलका ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है। त्रिशो&्थ्याय: सुशमकि प्रस्तावके अनुसार त्रिगतों और कौरवोंका मत्स्यदेशपर धावा वैशम्पायन उवाच अथ राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा रथयूथप: । प्राप्तकालमिदं वाक्यमुवाच त्वरितो बली,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर त्रिगर्तदेशके राजा महाबली सुशर्मने, जो रथियोंके समूहका अधिपति था, बड़ी उतावलीके साथ अपना यह समयोचित प्रस्ताव उपस्थित किया
vaiśampāyana uvāca | atha rājā trigartānāṃ suśarmā rathayūthapaḥ | prāptakālam idaṃ vākyam uvāca tvarito balī ||
ครั้งนั้น สุศรมะ กษัตริย์ผู้เกรียงไกรแห่งชาวตรีคฤตะ ผู้เป็นหัวหน้ากองรถศึก ได้กล่าวข้อเสนออันเหมาะแก่กาลนั้นด้วยความรีบร้อน
वैशम्पायन उवाच
The verse foregrounds prudent, situation-aware counsel: a leader should speak and act in a way that fits the moment (prāptakāla), especially in matters of statecraft and conflict.
After earlier developments, the Trigarta king Suśarmā urgently presents a timely proposal; this becomes the narrative trigger for coordinated action against the Matsya kingdom.