Puṣkara-Tīrtha-Māhātmya and the Phala of Pilgrimage
Nārada–Yudhiṣṭhira; Pulastya–Bhīṣma Transmission
शून्यामिव प्रपश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम् | बन्ाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम्,“मैं यत्र-तत्र यहाँकी जिस-जिस भूमिपर दृष्टि डालती हूँ, सबको सूनी-सी ही पाती हूँ। यह अनेक आश्चर्यसे भरा हुआ और विकसित कुसुमोंसे अलंकृत वृक्षोंवाला काम्यकवन भी सव्यसाची अर्जुनके बिना पहले-जैसा रमणीय नहीं जान पड़ता है। नीलमेघके समान कान्ति और मतवाले गजराजकी-सी गतिवाले उन कमलनयन अर्जुनके बिना यह काम्यकवन मुझे तनिक भी नहीं भाता है। राजन! जिनके धनुषकी टंकार बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देती है, उन सव्यसाचीकी याद करके मुझे तनिक भी चैन नहीं मिलता'
śūnyām iva prapaśyāmi tatra tatra mahīm imām | vanāścaryam idaṃ cāpi vanaṃ kusumita-drumam ||
ไม่ว่าข้าจะทอดสายตาไป ณ แผ่นดินนี้แห่งใด ก็เห็นประหนึ่งว่างเปล่าไปเสียทุกแห่ง แม้ป่าอันน่าอัศจรรย์นี้—ซึ่งประดับด้วยหมู่ไม้ดอกบานสะพรั่ง—ก็ไม่รื่นรมย์ดังเดิม เมื่อปราศจากสวยสาจี อรชุน
वैशम्पायन उवाच