व्यस्ते काले पुनश्चैति न चैति बहुशो द्विज: । सुदुर्लभमपि हान्नं दीयतामिति सोडब्रवीत्,वे कभी ऐसे समयमें लौटकर आते थे, जब कि पृथाको दूसरे कामोंसे दम लेनेकी भी फुरसत नहीं होती थी और कभी वे कई दिनोंतक आते ही नहीं थे। आनेपर भी ऐसा भोजन माँग लेते जो अत्यन्त दुर्लभ होता
บางคราวพราหมณ์นั้นกลับมาในยามที่ยุ่งยิ่งนัก และบางคราวก็ไม่มาเลยเป็นหลายวัน; ครั้นมาถึงยังกล่าวว่า “จงจัดอาหารแม้จะหาได้ยากยิ่งมาให้เราเถิด”
वैशम्पायन उवाच