सावित्री-यमसंवादः
Sāvitrī’s Dialogue with Yama and the Restoration of Satyavān
मा च ते3स्तु भयं भीरु रावणाल्लोकगर्लहितात् । नलकूबरशापेन रक्षिता हासि नन्दिनि,“उनका कहना है कि त्रिजटे! तुम मेरी ओरसे सीताको समझा-बुझाकर संतुष्ट करके यह कहना कि--ततुम्हारे स्वामी महाबली श्रीराम लक्ष्मणसहित सकुशल हैं। श्रीमान् रघुनाथजीने इन्द्रतुल्य तेजस्वी वानरराज सुग्रीवके साथ मैत्री की है और तुम्हें यहाँसे छुड़ानेके लिये उद्योग आस्मभ कर दिया है; अतः भीरु! अब तुम्हें लोकनिन्दित रावणसे तनिक भी भय नहीं करना चाहिये। नन्दिनी! नलकूबरने रावणको जो शाप दे रखा है, उसीसे तुम सदा सुरक्षित रहोगी। कुछ समय पहलेकी बात है, इस पापी रावणने नलकूबरकी पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके तुल्य रम्भाका स्पर्श किया था, इसीसे उसको शाप प्राप्त हुआ है। यद्यपि यह रावण जितेन्द्रिय नहीं है, तो भी किसी अवशा--स्वतन्त्रतापूर्वक उसे न चाहनेवाली नारीके पास नहीं जा सकता है। सुग्रीवद्वारा सुरक्षित तुम्हारे स्वामी बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके साथ शीघ्र ही यहाँ आयेंगे और तुम्हें यहाँसे छुड़ा ले जायँगे”
mā ca te 'stu bhayaṁ bhīru rāvaṇāl lokagarhitāt | nalakūbaraśāpena rakṣitā hāsi nandini ||
มารกัณฑยะกล่าวว่า “อย่าหวาดกลัวเลย ผู้หวั่นไหวเอ๋ย ต่อราวณะผู้ถูกโลกติเตียน ด้วยคำสาปของนลกูพร เธอได้รับการคุ้มครองอยู่ นางผู้เป็นที่รัก”
मार्कण्डेय उवाच
Adharma, even when backed by power, is constrained by moral law and its consequences: a wrongdoer becomes 'lokagarhita' (world-condemned), and righteous sanctions (here, Nalakūbara’s curse) function as protective boundaries. The verse also models compassionate speech—calming fear through truth-grounded reassurance.
Mārkaṇḍeya, recounting the Rāmāyaṇa episode within the Mahābhārata frame, conveys a message meant to steady Sītā: she should not fear Rāvaṇa because a prior curse from Nalakūbara restrains him, ensuring her protection until rescue.