पुष्पह्ेतो: कथं त्वार्य: करिष्यति युधिष्ठिर: । स्नेहान्नरवरो नूनमविश्वासाद् बलस्य च,मतवाले हाथीके समान ही उनकी लाल-लाल आँखें थीं। वे समरभूमिमें मदोन्मत्त हाथियोंको भी पीछे हटानेमें समर्थ थे। अपने प्रियतमके पार्श्वभागमें बैठी हुई यक्ष और गन्धर्वोकी युवतियाँ सब प्रकारकी चेष्टाओंसे निवृत्त हो स्वयं अलक्षित रहकर भीमसेनकी ओर देख रही थीं। वे उन्हें सौन्दर्यके नूतन अवतार-से प्रतीत होते थे। इस प्रकार पाण्डुनन्दन भीम गन्धमादनके रमणीय शिखरोंपर खेल-सा करते हुए विचरने लगे। वे दुर्योधनद्वारा दिये गये नाना प्रकारके असंख्य क्लेशोंका स्मरण करते हुए वनवासिनी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए थे। उन्होंने मन-ही-मन सोचा--“अर्जुन स्वर्गलोकमें चले गये हैं और मैं फूल लेनेके लिये इधर चला आया हूँ। ऐसी दशामें आर्य युधिष्ठिर कोई कार्य कैसे करेंगे? नरश्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर नकुल और सहदेवपर अत्यन्त स्नेह रखते हैं। उन दोनोंके बलपर उन्हें विश्वास नहीं है। अतः वे निश्चय ही उन्हें नहीं छोड़ेंगे, अर्थात् कहीं नहीं भेजेंगे। अब कैसे मुझे शीघ्र वह फूल प्राप्त हो जाय--यह चिन्ता करते हुए नरश्रेष्ठ भीम पक्षिराज गरुड़के समान वेगसे आगे बढ़े। उनके मन और नेत्र फूलोंसे भरे हुए पर्वतीय शिखरोंपर लगे हुए थे
Vaiśampāyana uvāca | puṣpa-hetoḥ kathaṃ tv āryaḥ kariṣyati yudhiṣṭhiraḥ | snehān naravaro nūnam aviśvāsād balasya ca ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—“เพราะเรื่องดอกไม้ อารยะยุธิษฐิระจะจัดการกิจการอย่างไรเล่า? บุรุษผู้ประเสริฐนั้น ด้วยความเอ็นดู และเพราะมิได้ไว้วางใจในกำลังของเขาทั้งสองอย่างเต็มที่ ย่อมไม่ยอมปล่อยนกุลกับสหเทวะ (ให้ออกไปลำพัง) เป็นแน่”
वैशम्पायन उवाच
Even a righteous leader must balance affection with practical judgment: love for dependents and doubts about their capacity shape decisions about delegation and risk.
In the context of Bhīma’s pursuit of flowers, the narrator reflects on Yudhiṣṭhira’s situation: because of his affection for Nakula and Sahadeva and limited confidence in their strength, Yudhiṣṭhira would not send them away or rely on them alone, complicating matters while Bhīma is absent.