Bhīmasena–Hanūmān Saṃvāda: The Tail Test and the Divine Path
६:22...8 #::3:.7 (_) मा अल - गौके समान एक प्रकारका जंगली पशु, जिसके गलकंबल नहीं होता। - हिमालयपर गिरनेके बाद भागीरथी गंगा अनेक धाराओंमें विभक्त होकर बहने लगीं। उनकी सीधी धारा तो गंगोत्तरीसे देवप्रयाग होती हुई हरिद्वार आयी है और अन्य धाराएँ अन्य मार्गोंसे प्रवाहित होकर पुनः गंगामें ही मिल गयी हैं। उन्हींकी जो धारा कैलास और बदरिकाश्रमके मार्गसे बहती आयी है, उसका नाम अलकनन्दा है। वह देवप्रयागमें आकर सीधी धारामें मिल गयी है। इस प्रकार यद्यपि नर-नारायणका स्थान अलकनन्दाके ही तटपर है, तथापि वह मूलतः भागीरथीसे अभिन्न ही है; इसीलिये यहाँ मूलमें 'भागीरथी” नामसे ही उसका उल्लेख किया गया है। षट्चत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमानजीसे भेंट वैशम्पायन उवाच तत्र ते पुरुषव्याप्रा: परमं शौचमास्थिता: । षड़ात्रमवसन् वीरा धनंजयदिदृक्षव:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! वे पुरुषसिंह वीर पाण्डव अर्जुनके दर्शनके लिये उत्सुक हो वहाँ परम पवित्रताके साथ छ: रात रहे
vaiśampāyana uvāca | tatra te puruṣavyāprāḥ paramaṃ śaucam āsthitāḥ | ṣaḍātram avasan vīrā dhanañjayadidṛkṣavaḥ ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—ณ ที่นั้น วีรบุรุษผู้ดุจราชสีห์ท่ามกลางมนุษย์ ตั้งมั่นในความบริสุทธิ์แห่งความประพฤติอันสูงสุด พำนักอยู่หกราตรี ด้วยความใคร่จะได้เห็นธนัญชัย (อรชุน)
वैशम्पायन उवाच
The verse foregrounds śauca—purity of body, mind, and conduct—as a prerequisite for sacred aims and disciplined waiting; the heroes’ eagerness to see Arjuna is framed within restraint and purification rather than impatience.
The Pāṇḍava heroes remain at that location for six nights, maintaining strict purity, because they are eager to meet and see Arjuna (Dhanañjaya).