द्रौपदीश्रमः तथा घटोत्कचस्मरणम्
Draupadī’s Exhaustion and the Summoning of Ghaṭotkaca
द्यौ: स्वित् पतति कि भूमिर्दीर्यते पर्वतो नु किम् । इति ते मेनिरे सर्वे पवनेनापि मोहिता:,हवाके झोंकेसे मोहित होकर वे सब-के-सब मन-ही-मन सोचने लगे कि आकाश तो नहीं फट पड़ा है। पृथ्वी तो नहीं विदीर्ण हो रही है अथवा कोई पर्वत तो नहीं फटा जा रहा है
dyauḥ svit patati ki bhūmir dīryate parvato nu kim | iti te menire sarve pavanenāpi mohitāḥ ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—เมื่อถูกลมกระโชกทำให้สับสน พวกเขาทั้งหมดก็คิดอยู่ในใจว่า “หรือท้องฟ้ากำลังถล่มลง? หรือแผ่นดินกำลังแยกออก? หรือภูเขาลูกใดกำลังถูกฉีกกระชาก?”
वैशम्पायन उवाच