अध्याय ८ — शल्यस्य सत्कारः, वरदानं, पाण्डवसमागमश्च (Śalya’s Reception, the Boon, and Meeting the Pāṇḍavas)
ममत्ववेक्षया वीर शृणु विज्ञापयामि ते । भवानिह च सारथ्ये वासुदेवसमो युधि,परंतु पृथ्वीपते! आपका कल्याण हो। मैं आपके द्वारा अपना भी एक काम कराना चाहता हूँ। साधु शिरोमणे! वह न करने योग्य होनेपर भी मेरी ओर देखते हुए आपको अवश्य करना चाहिये। वीरवर! सुनिये; मैं वह कार्य आपको बता रहा हूँ। महाराज! आप इस भूतलपर संग्राममें सारथिका काम करनेके लिये वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके समान माने ये हैं
mamatvavekṣayā vīra śṛṇu vijñāpayāmi te | bhavāniha ca sārathye vāsudevasamo yudhi ||
ยุธิษฐิระกล่าวว่า “โอวีรบุรุษ จงฟังเถิด ด้วยเห็นแก่ข้า ข้าขอกราบทูลคำนี้ ในสนามรบนี้ ในกิจแห่งการเป็นสารถี ท่านได้รับการยกย่องว่าเสมอด้วยวาสุเทวะ (พระกฤษณะ)”
युधिछिर उवाच