अर्जुनोक्तिः—कृष्णं प्रति पुरुषकार‑कर्म‑विचारः
Arjuna’s Address to Krishna: Agency, Action, and Immediate Counsel
स एव हेतुर्भूत्वा हि पुरुषस्यार्थसिद्धिषु । विनाशेडपि स एवास्य संदिग्धं॑ कर्म पौरुषम्,क्योंकि उपर्युक्त पुरुषार्थ ही कभी पुरुषकी कार्य-सिद्धिमें कारण बनकर कभी विनाशका भी हेतु बन जाता है। इस प्रकार जैसे दैवका फल संदिग्ध है, वैसे ही पुरुषार्थका भी फल संदिग्ध है
ความเพียรของมนุษย์นั่นเอง บางคราวเป็นเหตุให้กิจสำเร็จ บางคราวกลับเป็นเหตุแห่งความพินาศ ดังนั้นผลแห่งเดชะชะตาย่อมคลุมเครือฉันใด ผลแห่งความเพียรก็คลุมเครือฉันนั้น
भीमसेन उवाच