Udyoga Parva Adhyāya 58 — Saṃjaya’s Audience and Kṛṣṇa’s Deterrent Counsel (संजय-प्रवेशः कृष्णवाक्यं च)
ऑपन--मा_जल छा जज ड:ि:अ एकोनषशष्टितमो< ध्याय: संजयका 4:30 87 छनेपर उन्हें श्रीकृष्ण और अर्जुनके अन्तःपुरमें कहे हुए संदेश सुनाना धृतराष्ट उवाच यदब्रूतां महात्मानौ वासुदेवधनंजयौ । तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ शुश्रूषे वचनं तव,धृतराष्ट्रने पूछा--महाप्राज्ञ संजय! महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने जो कुछ कहा हो, वह मुझे बताओ; मैं तुम्हारे मुखसे उनके संदेश सुनना चाहता हूँ
dhṛtarāṣṭra uvāca | yad abrūtāṃ mahātmānau vāsudeva-dhanañjayau | tan me brūhi mahāprājña śuśrūṣe vacanaṃ tava ||
ธฤตราษฏระตรัสว่า “สิ่งใดก็ตามที่มหาบุรุษทั้งสอง—วาสุเทวะ (กฤษณะ) และธนัญชยะ (อรชุน)—ได้กล่าวไว้ จงบอกแก่เราเถิด โอสัญชัยผู้มีปัญญายิ่ง เราปรารถนาจะฟังสารของเขาทั้งสองจากปากของเจ้าเอง”
धृतराष्ट उवाच