Ārjava, Satya, and the Virocana–Sudhanvan Exemplum
Udyoga-parva 35
अरुन्तुदं परुषं रूक्षवा्चं वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यान् । विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निबद्धां निर्क्रतिं वै वहन्तम्,जिसकी वाणी रूखी और स्वभाव कठोर है, जो मर्मस्थानपर आघात करता और वाग्बाणोंसे मनुष्योंको पीड़ा पहुँचाता है, उसे ऐसा समझना चाहिये कि वह मनुष्योंमें महादरिद्र है और वह अपने मुखमें दरिद्रता अथवा मौतको बाँधे हुए ढो रहा है
ผู้ใดมีวาจาหยาบกระด้าง นิสัยแข็งกร้าว กระทบมรรมนัย และทิ่มแทงผู้คนด้วยหนามแห่งถ้อยคำ—พึงรู้ว่าเขาเป็นผู้ยากไร้ที่สุดในหมู่มนุษย์ ราวกับผูกความอับโชค—ถึงกับความตาย—ไว้ที่ปากของตนแล้วแบกพาไป
हंस उवाच