ययातिदौहित्रपुण्यसमुच्चयः | Yayāti and the Grandsons’ Consolidation of Merit
कि मया मनसा ध्यातमशुभं धर्मदूषणम् | येनाहं चलितः स्थानादिति राजा व्यचिन्तयत्,वे अन्धकारसे आवृत होनेके कारण स्वयं स्वर्गवासियोंको नहीं दिखायी देते थे; परंतु वे उन्हें बार-बार देखते और कभी नहीं भी देख पाते थे। पृथ्वीपर गिरनेसे पहले शून्य-से होकर शून्य हृदयसे राजा यह चिन्ता करने लगे कि मैंने अपने मनसे किस धर्मदूषक अशुभ वस्तुका चिन्तन किया है, जिसके कारण मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट होना पड़ा है
kiṃ mayā manasā dhyātam aśubhaṃ dharmadūṣaṇam | yenāhaṃ calitaḥ sthānād iti rājā vyacintayat ||
พระราชาทรงรำพึงว่า—“เราคิดสิ่งอัปมงคลอันเป็นมลทินแก่ธรรมข้อใดในใจ จึงถูกสั่นคลอนให้หลุดจากฐานะของตนเล่า?”
नारद उवाच