श्रोतव्यमपि पश्यामि सुहृदां कुरुनन्दन । न कर्तव्यश्न निर्बन्धो निर्बन्धो हि सुदारुण:,कुरुनन्दन! मैं देखता हूँ कि तुम्हें अपने सुहृदोंके उपदेशको सुननेकी विशेष आवश्यकता है; अतः तुम्हें किसी एक बातका दुराग्रह नहीं रखना चाहिये। आग्रहका परिणाम बड़ा भयंकर होता है
โอ้กุรุนันทนะ! ข้าพเจ้าเห็นว่าเจ้าควรสดับคำตักเตือนของสหายผู้หวังดี; เพราะฉะนั้นอย่ายึดติดดื้อดึงในเรื่องใดเรื่องหนึ่งเลย ความดื้อรั้นนั้นให้ผลน่าหวาดหวั่นยิ่งนัก
नारद उवाच