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Shloka 1

Chapter 81: Trust, Allies, and the Qualifications of the King’s Artha-Secretary (अर्थसचिव)

2: छा आर: अशीतितमोब<्ध्याय: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन युधिछिर उवाच यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्‌ । पुरुषेणासहायेन किमु राज्ञा पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो छोटे-से-छोटा काम है, उसे भी बिना किसीकी सहायताके अकेले मनुष्यके द्वारा किया जाना कठिन हो जाता है। फिर राजा दूसरेकी सहायताके बिना महान्‌ राज्यका संचालन कैसे कर सकता है? इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अशीतितमो<ध्याय: ।। ८० || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वनें अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८० ॥। अपना बा || ऑफ क्रा्छ > सहार्थ मित्र उनको कहते हैं, जो किसी शर्तपर एक-दूसरेकी सहायताके लिये मित्रता करते हैं। “अमुक शत्रुपर हम दोनों मिलकर चढ़ाई करें, विजय होनेपर दोनों उसके राज्यको आधा-आधा बाँट लेंगेट--इत्यादि शर्तें सहार्थ मित्रोंमें होती हैं। जिनके साथ परम्परागत वंशसम्बन्धसे मित्रता हो, वे भजमान” कहलाते हैं। जन्मसे ही साथ रहनेसे अथवा घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके कारण जिनमें परस्पर स्वाभाविक मैत्री हो जाती है वे 'सहज' मित्र कहे गये हैं; और धन आदि देकर अपनाये हुए लोग “कृत्रिम” मित्र कहलाते हैं। - प्रकृतियाँ तीन प्रकारकी बतायी गयी हैं--अर्थप्रकृति, धर्मप्रकृति तथा अर्थ-धर्मप्रकृति। इनमें अर्थ-प्रकृतिके अन्तर्गत आठ वस्तुएँ हैं--खेती, वाणिज्य, दुर्ग, सेतु (पुल), जंगलमें हाथी बाँधनेके स्थान, सोने-चाँदी आदि धातुओंकी खान, कर- ग्रहण और सूने स्थानोंको बसाना। इनके अतिरिक्त जो दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य और ज्यौतिषी--ये सात प्रकृतियाँ हैं, इनमेंसे “धर्माध्यक्ष' तो धर्मप्रकृति हैं और शेष छ: “अर्थ-धर्मप्रकृति” के अन्तर्गत हैं। एकाशीतितमो<ध्याय: कुट॒म्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद युधिछ्िर उवाच एवमग्राह्ुके तस्मिन्‌ ज्ञातिसम्बन्धिमण्डले । मित्रेष्वमित्रेष्वपि च कथं भावो विभाव्यते

yudhiṣṭhira uvāca | yad apy alpataram karma tad apy ekena duṣkaram | puruṣeṇāsahāyena kimu rājñā pitāmaha ||

ยุธิษฐิระกล่าวว่า “ปิตามหะ! แม้งานเล็กน้อยที่สุด หากต้องทำเพียงลำพังไร้ผู้ช่วย ก็ยังยากยิ่ง แล้วกษัตริย์จะทรงบริหารแผ่นดินอันกว้างใหญ่ได้อย่างไร หากปราศจากความเกื้อหนุนของผู้อื่น?”

यद्whatever/which
यद्:
Karma
TypePronoun
Rootयद्
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
अपिeven/also
अपि:
TypeIndeclinable
Rootअपि
अल्पतरम्smaller/very small
अल्पतरम्:
Karma
TypeAdjective
Rootअल्पतर
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
कर्मtask, work
कर्म:
Karma
TypeNoun
Rootकर्मन्
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
तद्that
तद्:
Karma
TypePronoun
Rootतद्
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
अपिeven
अपि:
TypeIndeclinable
Rootअपि
एकेनby one (alone)
एकेन:
Karana
TypeNumeral/Adjective
Rootएक
FormMasculine/Neuter, Instrumental, Singular
दुष्करम्difficult to do
दुष्करम्:
TypeAdjective
Rootदुष्कर
FormNeuter, Nominative, Singular
पुरुषेणby a man/person
पुरुषेण:
Karana
TypeNoun
Rootपुरुष
FormMasculine, Instrumental, Singular
असहायेनwithout help, unaided
असहायेन:
Karana
TypeAdjective
Rootअ-सहाय
FormMasculine, Instrumental, Singular
किम्what? how?
किम्:
TypePronoun
Rootकिम्
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
indeed/then (emphatic particle)
:
TypeIndeclinable
Root
राज्ञाby a king
राज्ञा:
Karana
TypeNoun
Rootराजन्
FormMasculine, Instrumental, Singular
पितामहO grandsire
पितामह:
TypeNoun
Rootपितामह
FormMasculine, Vocative, Singular

युधिछिर उवाच

Y
Yudhiṣṭhira
B
Bhīṣma (Pitāmaha)
K
king (rājā)
K
kingdom (rājya, implied)