Rāma–Jāmadagnya-janma-kāraṇa and Kṣatra-kṣaya
Paraśurāma’s origins and the depletion/restoration of kṣatriya lineages
ऋचीक उवाच नोक्तपूर्वनितं भद्रे स्वैरेष्वपि कदाचन । किमुताग्निं समाधाय मन्त्रवच्चरुसाधने,ऋचीक बोले--भट्रे! मैंने कभी हास-परिहासमें भी झूठी बात नहीं कही है; फिर अग्निकी स्थापना करके मन्त्रयुक्त चरु तैयार करते समय मैंने जो संकल्प किया है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है?
ฤจีกะกล่าวว่า “แม่ผู้เจริญ เราไม่เคยกล่าวเท็จเลย แม้ในยามหยอกล้อ; แล้วคำปณิธานที่เราตั้งไว้ขณะสถาปนาไฟบูชาและปรุงจรุด้วยมนตร์ จะเป็นเท็จได้อย่างไร”
ऋचीक उवाच