अध्याय ३५१ — उञ्छवृत्ति-व्रतसिद्धेः मानुषस्य परमगतिः
Sūrya–Nāga Dialogue on the Perfected Gleaner-Ascetic
यक्किंचिद् विद्यते लोके सर्व तन्मद्विचेष्टितम् । अन्यो हान्यं चिन्तयति स्वच्छन्दं विद्धाम्यहम्,“संसारमें जो कुछ हो रहा है, वह सब मेरी ही चेष्टाका फल है। दूसरे लोग दूसरी-दूसरी बातें सोचते रहते हैं, परंतु मैं स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार कार्य करता हूँ!
สิ่งใดก็ตามที่มีอยู่ในโลก ล้วนเป็นผลแห่งความเพียรของเราเอง ผู้อื่นย่อมคิดไปต่างๆ นานา แต่เรากระทำการโดยเสรี ตามความประสงค์ของตน
वैशम्पायन उवाच