नरनारायण-नारदसंवादः
Nara-Nārāyaṇa–Nārada Discourse on Vision, Elements, and Entry into Vāsudeva
रविस्तु संतापयते लोकान् रश्मिभिरुल्बणै: । सर्वतस्तेज आदत्ते नित्यमक्षयमण्डल:,सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समस्त जगत्को संतप्त करते हैं। वे सब जगहसे तेजको स्वयं ग्रहण करते हैं (उनके तेजका कभी हास नहीं होता); इसलिये उनका मण्डल सदा अक्षय बना रहता है
ravis tu santāpayate lokān raśmibhir ulbaṇaiḥ | sarvatas teja ādatte nityam akṣayamaṇḍalaḥ ||
นารทกล่าวว่า “สุริยะเผาโลกทั้งหลายด้วยรัศมีอันกร้าวกล้า. เขาดึงเอาเดชและแสงจากทุกทิศอยู่เนืองนิตย์; มณฑลของเขามิได้ร่อยหรอเลย ฉะนั้นสุริยจักรจึงดำรงอยู่อย่างอักขยะ—ไม่เสื่อมสูญ.”
नारद उवाच