द्वन्द्धारामेषु भूतेषु य एको रमते मुनि: । विद्धि प्रज्ञानतृप्तं तं॑ ज्ञानतृप्तो न शोचति,जो मुनि मैथुनमें सुख माननेवाले प्राणियोंके बीचमें रहकर भी अकेले रहनेमें ही आनन्द मानता है, उसे विज्ञानसे परितृप्त समझना चाहिये। जो ज्ञानसे तृप्त होता है, वह कभी शोक नहीं करता
มุนีผู้แม้อยู่ท่ามกลางหมู่สัตว์ที่เพลิดเพลินในทวิภาวะทั้งหลาย ก็ยังยินดีในความสงัดเพียงลำพัง จงรู้เถิดว่าเขาอิ่มเอิบด้วยปรีชาญาณ ผู้ที่อิ่มเอิบด้วยญาณย่อมไม่โศกเลย
नारद उवाच