सुवर्णष्ठीविनोपाख्यानम्
The Account of Suvarṇaṣṭhīvin
तमहं नृपतिं दीनमब्रवं पुनरेव च । स्मर्तव्यो5स्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम्,तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा--“महाराज! संकटके समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराजके वशभमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः: उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा”
tam ahaṁ nṛpatiṁ dīnam abravāṁ punar eva ca | smartavyo ’smi mahārāja darśayiṣyāmi te sutam ||
แล้วข้าพเจ้ากล่าวแก่พระราชาผู้เศร้าหมองนั้นอีกครั้งว่า “ข้าแต่มหาราช เมื่อคราวทุกข์เข็ญจงระลึกถึงเรา เราจักให้ท่านได้เห็นบุตรของท่าน”
पर्वत उवाच