Adhyāya 302: Guṇa-vicāra, Gati-bheda, and the Imperishable State
Yājñavalkya–Janaka
स्वक्षरं प्रश्मितं वाक््यं मधुरं चाप्यनुल्बणम् | पप्रच्छर्षिवरं राजा करालजनक: पुरा,मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठजी अध्यात्मविषयक प्रवचनमें अत्यन्त कुशल थे और उन्हें अध्यात्मज्ञानका निश्चय हो गया था। वे एक आसनपर विराजमान थे। पूर्वकालमें कराल नामक राजा जनकने उन मुनिवरके पास जा हाथ जोड़कर प्रणाम किया और सुन्दर अक्षरोंसे युक्त विनयपूर्ण तथा कुतर्करहित मधुर वाणीमें इस प्रकार पूछा--
svakṣaraṁ praśmitaṁ vākyaṁ madhuraṁ cāpy anulbaṇam | papracchārṣivaraṁ rājā karālajanakaḥ purā ||
กาลก่อน พระเจ้าชนกผู้มีนามว่า ‘กราละ’ ได้ทูลถามฤๅษีผู้ประเสริฐ ด้วยถ้อยคำเรียงร้อยงดงาม น้ำเสียงแย้มยิ้มอ่อน ๆ ไพเราะ สุภาพนอบน้อม ปราศจากความกระด้างและการโต้เถียงอันจู้จี้
भीष्म उवाच