द्विगुणं च रजो ज्ञात्वा सत्त्वमेकगुणं पुन: । मार्ग विज्ञाय तत्त्वेन प्रलये प्रेक्षणे तथा,वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! जो ज्ञानके द्वारा मनुष्य, पिशाच, राक्षस, यक्ष, सर्प, गन्धर्व, पितर, तिर्यग्योनि, गरुड़, मरुदण, रार्जर्षि, ब्रह्मर्षि, असुर, विश्वेदेव, देवर्षि, योगी, प्रजापति तथा ब्रह्माजीके भी सम्पूर्ण दुर्जय विषयोंकों सदोष जानकर, संसारके मनुष्योंका परमायुकाल तथा सुखके परमतत्त्वका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और विषयोंकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको समय-समयपर जो दु:ख प्राप्त होता है, उसको, तिर्यग्योनि और नरकमें पड़नेवाले जीवोंके दुःखको, स्वर्ग तथा वेदकी फल-श्रुतियोंके सम्पूर्ण गुण-दोषोंको जानकर ज्ञानयोग, सांख्यज्ञान और योगमार्गके गुण-दोषोंको भी समझ लेते हैं तथा भरतनन्दन! सत्त्वगुणके दस, रजोगुणके नौउ, तमोगुणके आठ, बुद्धिके सातरं, मनके छ:5 और आकाशके पाँचः गुणोंका ज्ञान प्राप्त करके बुद्धिके दूसरे चार, तमोगुणके दूसरे तीन, रजोगुणके दूसरे दो* और सत्त्वगुणके पुनः: एक* गुणको जानकर आत्माकी प्राप्ति करानेवाले मार्ग--प्राकृत प्रलय तथा आत्मविचारको ठीक-ठीक जान लेते हैं, वे ज्ञान- विज्ञानसे सम्पन्न तथा मोक्षोपयोगी साधनोंके अनुष्ठानसे शुद्धचित्त हुए कल्याणमय सांख्ययोगी परम आकाशको प्राप्त होनेवाले सूक्ष्म भूतोंक समान मंगलमय मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं
dviguṇaṁ ca rajo jñātvā sattvam ekaguṇaṁ punaḥ | mārgaṁ vijñāya tattvena pralaye prekṣaṇe tathā ||
ภีษมะกล่าวว่า เมื่อรู้ชัดว่า “รชัส” มีลักษณะเป็นสองชั้น และ “สัตตวะ” โดยแก่นแท้เป็นหนึ่งเดียว อีกทั้งหยั่งรู้ตามความจริงถึงหนทางอันถูกต้อง ตลอดจนหลักแห่งปรลัย (การสลายคืน) และวินัยแห่งการเพ่งพิจารณาภายในแล้ว บุคคลย่อมสามารถพิจารณาอารมณ์แห่งอินทรีย์พร้อมทั้งโทษของมัน และก้าวสู่โมกษะด้วยญาณอันชอบได้
भीष्म उवाच
The verse emphasizes discriminative knowledge of the guṇas—especially the structure of rajas and sattva—and insists that liberation-oriented practice depends on grasping the true path along with the principles of dissolution (pralaya) and contemplative inner examination (prekṣaṇa).
In Śānti Parva, Bhishma continues his post-war instruction to Yudhishthira, shifting from external duties to inner disciplines: analysis of nature (guṇas), correct discernment of the path, and contemplative insight that supports renunciation and liberation.