Ātma-saṃyama-dharma: One-pointedness of Mind and Senses (शुक–व्यास संवादः)
भूय एव तु लोके5स्मिन् सद्वृत्ति कालहैतुकीम् | यया सन्त: प्रवर्तन्ते तदिच्छाम्यनुवर्तितुम्,अब पुनः इस संसारमें प्रत्येक युगके अनुसार जो शिष्ट पुरुषोंकी आचार-परम्परा रही है तथा जिसके अनुकूल सत्पुरुषोंका बर्ताव होता आया है, उसका मैं भी अनुसरण करना चाहता हूँ
ในโลกนี้ ตามกาลตามยุคสมัย มีจารีตแห่งความประพฤติอันประเสริฐของชนผู้เป็นแบบอย่าง ซึ่งเหล่าสัตบุรุษได้ดำเนินตามมาโดยสอดคล้องกัน—ข้าพเจ้าก็ปรารถนาจะดำเนินตามจารีตนั้นเช่นกัน
शुक उवाच