Adhyāya 222 — ब्रह्मस्थानप्राप्ति: मोक्षधर्मे समत्वव्रतम्
Attaining the Brahman-Station: The Vow of Equanimity in Mokṣadharma
विकारानेव यो वेद न वेद प्रकृतिं पराम् । तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भो5नुपश्यत:,जो विकारों (कार्यों) को ही जानता है, उनकी परम प्रकृति (स्वभाव) को नहीं जानता, उसीको अविवेकके कारण मोह या अभिमान होता है। जो इस बातको ठीक-ठीक समझता है, उसे मोह नहीं होता
ผู้ใดรู้เพียงวิการะ—ความแปรเปลี่ยนที่เป็นผล—แต่ไม่รู้ปรกฤติอันสูงสุด ผู้นั้นย่อมเกิดความหลงหรือความถือตัวเพราะปัญญาอันยังอ่อน; แต่ผู้ที่เห็นตามความเป็นจริง ย่อมไม่มีความติดค้างแข็งทื่อเช่นนั้น (คือโมหะ/อหังการ) เลย
प्रह्माद उवाच