प्रजापतयः देवगणाश्च दिशि-दिशि स्थिताः ऋषयः
Prajāpatis, Deva-Groups, and the Ṛṣis Assigned to the Directions
न स्त्री पुमान् नापि नपुंसकं च न सन्न चासत् सदसच्च तन्न । पश्यन्ति यद् ब्रह्मविदो मनुष्या- स्तदक्षरं न क्षरतीति विद्धि,वह न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है। न सत् है, न असत् है और न सदसत् उभयरूप ही है। ब्रह्मज्ञानी पुरुष ही उसका साक्षात्कार करते हैं। उसका कभी क्षय नहीं होता; इसलिये वह अविनाशी परब्रह्म परमात्मा अक्षर कहलाता है, इस बातको अच्छी तरह समझ लो
na strī pumān nāpi napuṁsakaṁ ca na san na cāsat sadasac ca tan na | paśyanti yad brahmavido manuṣyās tad akṣaraṁ na kṣaratīti viddhi ||
ภีษมะกล่าวว่า “พระพรหมันนั้นมิใช่หญิง มิใช่ชาย มิใช่เพศกลาง มิใช่ความมีอยู่ มิใช่ความไม่มีอยู่ และมิใช่ทั้งมีทั้งไม่มี ผู้รู้พรหมันเท่านั้นจึงประจักษ์แจ้งได้ และเพราะพระองค์ไม่เคยเสื่อมหรือสูญสลาย จงรู้เถิดว่าพระองค์จึงได้ชื่อว่า ‘อักษระ’—ผู้ไม่เสื่อมสลาย”
भीष्म उवाच