Keśava-tattva-kathana
On the Principle of Keśava: Cosmogony and Divine Epithets
विष्णु: सहस्रशीर्षश्ष देवो 5चिन्त्य: समागमत् | अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि वा विभो,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवषण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे
bhīṣma uvāca | viṣṇuḥ sahasraśīrṣaś ca devo 'cintyaḥ samāgamat | avādyantāntarikṣe ca bheryas tūryāṇi vā vibho ||
ภีษมะกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา พระวิษณุผู้เป็นเทพอันยากหยั่งถึง และเศษะผู้มีเศียรพันเศียรก็เสด็จมาถึง ณ ที่นั้น และข้าแต่มหาบุรุษ ในท้องฟ้ากลองศึกและแตรสังข์กึกก้องกังวาน”
भीष्य उवाच