Ajagara-vrata (The ‘Python’ Discipline): Prahrāda Questions a Wandering Sage
इमं हत्वा गृहीत्वा च यास्ये5हं समभिद्रुतम्,“अब मैं कौन-सा उपाय करके अपने प्राणोंको धारण कर सकूँगा?' इस प्रकारकी चिन्तामें वह मग्न हो गया। पुरुषसिंह! तदनन्तर मार्गमें भोजनके लिये कुछ भी न देखकर उस कृतघ्नने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया--'यह बगुलोंका राजा राजधर्मा मेरे पास ही तो है। यह मांसका एक बहुत बड़ा ढेर है। इसीको मारकर ले लूँ और शीचघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दूँ”
imaṁ hatvā gṛhītvā ca yāsye ’haṁ samabhidrutam
“ฆ่าเขาแล้วฉวยเอาไป เราจะจากที่นี่ไปทันทีโดยเร็ว”
भीष्म उवाच