असंतोषादिदोष-निरूपणम्
On the Faults of Discontent and the Discipline of Detachment
एशि: पाप्मभिराविष्टो राज्यं त्वमभिकांक्षसे । निरामिषो विनिर्मुक्त: प्रशान्त: सुसुखी भव,युधिष्ठिर बोले--भीमसेन! असंतोष, प्रमाद, मद, राग, अशान्ति, बल, मोह, अभिमान तथा उद्वेग--ये सभी पाप तुम्हारे भीतर घुस गये हैं, इसीलिये तुम्हें राज्यकी इच्छा होती है। भाई! सकाम कर्म और बन्धनसे- रहित होकर सर्वथा मुक्त, शान्त एवं सुखी हो जाओ
eṣiḥ pāpmabhir āviṣṭo rājyaṃ tvam abhikāṅkṣase | nirāmiṣo vinirmuktaḥ praśāntaḥ susukhī bhava ||
ยุธิษฐิระกล่าวว่า “เจ้าถูกครอบงำด้วยแรงผลักแห่งบาป จึงใฝ่หาความเป็นใหญ่ จงเป็นผู้ไร้ความอยากในอารมณ์แห่งอินทรีย์ หลุดพ้นจากพันธนาการ สงบระงับโดยสิ้นเชิง และเป็นสุขอย่างแท้จริง”
युधिछिर उवाच