पूजन्युवाच सकृत् कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतः । न तद् बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम्,पूजनी बोली--राजन्! एक बार किसीका अपराध करके फिर वहीं आश्रय लेकर रहे तो विद्वान् पुरुष उसके इस कार्यकी प्रशंसा नहीं करते हैं। वहाँसे भाग जानेमें ही उसका कल्याण है
ปูชนีกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา ผู้ที่กระทำผิดครั้งหนึ่งแล้วกลับยังคงค้างอยู่ ณ ที่เดิมนั้น บัณฑิตทั้งหลายไม่สรรเสริญ การถอยห่างจากที่นั้นต่างหากเป็นสิริมงคลแก่เขา”
ब्रह्मदत्त उवाच