आशा-कृशता उपाख्यानम्
The Episode on the Emaciation Caused by Hope
भीकम (2 अमान पजञ्चविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न--उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना युधिछिर उवाच शीलं प्रधानं पुरुषे कथितं ते पितामह । कथं त्वाशा समुत्पन्ना या चाशा तद् वदस्व मे,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! आपने पुरुषमें शीलको ही प्रधान बताया है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आशाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आशा क्या है? यह भी मुझे बताइये
yudhiṣṭhira uvāca |
śīlaṁ pradhānaṁ puruṣe kathitaṁ te pitāmaha |
kathaṁ tv āśā samutpannā yā cāśā tad vadasva me ||
ยุธิษฐิระกล่าวว่า—“โอ้ปิตามหะ! ท่านได้ประกาศแล้วว่า ‘ศีละ’ คือความประพฤติดี เป็นคุณอันประธานในมนุษย์ บัดนี้ขอท่านจงบอกแก่ข้าพเจ้าเถิดว่า ‘อาศา’ คือความหวังนั้น เกิดขึ้นได้อย่างไร? และแท้จริงแล้วความหวังคือสิ่งใด? โปรดอธิบายแก่ข้าพเจ้า”
युधिछिर उवाच